केले में काले धब्बेकेला एक ऐसी फसल है जिसे किसान आसानी से लगा लेते हैं, लेकिन इसकी सही समय पर देखभाल करना बहुत जरूरी होता है. अगर पौधों की समय-समय पर जांच और दवा का छिड़काव नहीं किया जाए तो कई तरह की बीमारियां फसल को खराब कर देती हैं. खासकर जुलाई और अगस्त में लगाए गए केले के पौधे जब बड़े होने लगते हैं, तब उनमें रोग लगने का खतरा ज्यादा रहता है. अगर किसान ध्यान नहीं देंगे तो पूरी मेहनत बेकार हो सकती है.
केले की फसल में तीन बड़ी बीमारियां ज्यादा देखने को मिलती हैं. पहली है पनामा विल्ट, दूसरी है सिगाटोका (पत्ती धब्बा रोग) और तीसरी है तना गलन. जब ये बीमारियां लगती हैं तो केले की पत्तियां काली पड़ने लगती हैं. पत्तियां कमजोर होकर सूख जाती हैं. इससे पौधे में फूल नहीं आते और फल भी ठीक से नहीं बनता. धीरे-धीरे पूरा पौधा खराब हो सकता है.
पीला सिगाटोका रोग में पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले धब्बे दिखाई देते हैं. बाद में ये धब्बे बड़े हो जाते हैं और पत्तियां सूखने लगती हैं. वहीं काला सिगाटोका इससे भी ज्यादा खतरनाक होता है. इसमें पत्तियों पर बड़ी काली धारियां बन जाती हैं. पत्तियां मुड़ जाती हैं और गिरने लगती हैं. इस रोग से 40 से 45 प्रतिशत तक फसल खराब हो सकती है.
पनामा विल्ट एक गंभीर बीमारी है जो मिट्टी से फैलती है. इसमें सबसे पहले पत्तियों के किनारे पीले होने लगते हैं. फिर तने का निचला हिस्सा फटने लगता है. अगर तने को काटकर देखें तो अंदर लाल-भूरे रंग के निशान दिखाई देते हैं. यह बीमारी फूल आने के समय ज्यादा लगती है. अगर समय पर इलाज नहीं किया गया तो पूरा पौधा सूख सकता है.
केले की खेती कर रहे किसानों का कहना है कि अगर समय पर दवा का छिड़काव कर दिया जाए तो फसल बचाई जा सकती है. पनामा विल्ट और सिगाटोका रोग को रोकने के लिए किसान “साइफर मेथीन” नाम की दवा का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस दवा का छिड़काव दो से तीन बार करना चाहिए.
कृषि अधिकारी बताते हैं कि फफूंदी से बचाव के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, कार्बेन्डाजिम या रेडोमिल जैसी दवाएं भी उपयोगी हैं. इन दवाओं को 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल बनाएं और फिर पौधों पर छिड़काव करें. इससे रोग फैलने से रुक जाता है.
केले की फसल में कभी-कभी तना छेदक कीड़ा भी लग जाता है. यह कीड़ा तने में छेद कर देता है, जिससे पौधे में पानी ज्यादा निकलने लगता है और पौधा कमजोर हो जाता है. इससे बचाव के लिए कटरा फाइट्रा क्लोराइड दानेदार दवा को खाद में मिलाकर मेड़ों की छपाई करते समय डालें. इससे नीचे से लगने वाला रोग नियंत्रित हो सकता है.
जब किसान पत्तियों पर दवा का छिड़काव करते हैं तो कभी-कभी दवा नीचे गिर जाती है और पत्तियों पर ठीक से चिपकती नहीं है. इसलिए दवा में थोड़ा सा निरमा मिलाकर छिड़काव करना चाहिए. इससे दवा पत्तियों पर अच्छी तरह चिपक जाती है और ज्यादा असर करती है. छोटे पत्तों में सिलिकॉन ज्यादा होता है, इसलिए दवा टिके रहना जरूरी है.
सबसे अच्छी बात यह है कि एक बीघा केले की फसल में दवा का छिड़काव करने में केवल 200 से 250 रुपये का खर्च आता है. इतने कम खर्च में किसान अपनी पूरी फसल को बचा सकते हैं. अगर समय पर पहचान और सही दवा का इस्तेमाल किया जाए तो बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है.
इसलिए किसान भाइयों को चाहिए कि वे अपने खेत की नियमित जांच करें. जैसे ही पत्तियों में पीले या काले धब्बे दिखें, तुरंत दवा का छिड़काव करें. सही समय पर सही कदम उठाने से केले की फसल सुरक्षित रहेगी और किसानों को अच्छा लाभ मिलेगा.
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