
पुणे में ओलावृष्टि से तरबूज की फसल को नुकसानपुणे में पिछले तीन से चार दिनों से हो रही बेमौसम बारिश और तेज ओलावृष्टि ने किसानों को बड़ा झटका दिया है. खासकर जैविक खेती के जरिए तरबूज उत्पादन करने वाले किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. जहां पहले लगभग 100 टन उत्पादन की उम्मीद थी, वहीं अब केवल 6 से 7 टन उत्पादन मिलने की संभावना जताई जा रही है. सोने जैसी तैयार फसल अब मिट्टी के भाव हो गई है, जिससे किसानों में नाराजगी का माहौल है.
बड़ा नुकसान झेलने वालों में नितीन गायकवाड और रूपाली गायकवाड भी शामिल हैं जो पिछले आठ वर्षों से तरबूज की खेती कर रहे हैं. हर साल की तरह इस साल भी उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद थी, जिससे उनके कुछ सपने पूरे हो सकते थे. लेकिन बेमौसम बारिश ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.
गायकवाड दंपति ने बताया कि उन्हें 120 टन उत्पादन की उम्मीद थी, लेकिन अब 10 टन भी मिलने की संभावना नहीं है. पूरे खेत में ओले की परत बिछ गई है जिससे तरबूज के पौधे और फल दोनों तहस-नहस हो गए हैं. गायकवाड के बोए तरबूज स्थानीय मार्केट में ही बिक जाते हैं क्योंकि इसकी भारी मांग रहती है. इस बार गर्मी को देखते हुए मांग में और अभी अधिक वृद्धि की संभावना थी, मगर उससे पहले ही ओले ने पूरी फसल को चौपट कर दिया.
अप्रैल के शुरुआती दिनों में हुई बारिश का पानी खेतों में पूरी तरह भर गया जिसमें पौधे डूब गए. खेत में 120 टन तरबूज उत्पादन का अनुमान था, लेकिन 7-8 पैदावार भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी.
गायकवाड के तरबूज की खेती खास तौर तरह से की जाती है, इसलिए दूर-दूर के ग्राहक उनके खेतों में खरीदारी करने आते हैं. वे अपने पौधों पर केमिकल खाद कभी नहीं देते बल्कि उसकी जगह पर जीवामृत और गोबर, गोमूत्र, बेसन और दूध से बने मिश्रण का छिड़काव करते हैं. इससे तरबूज की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक होती है और फलों में बहुत मिठास होती है. इस खासियत की वजह से गायकवाड के तरबूज का रेट बाकी किसानों से अच्छा मिलता है.
गायकवाड ने बताया कि उनके खेत में पैदा हुए तरबूज एक महीने तक खराब नहीं होते क्योंकि उस पर किसी केमिकल का प्रयोग नहीं किया जाता. खेती पर होने वाले खर्च के बारे में उन्होंने कहा कि इस बार 5 लाख रुपये खर्च हुए थे और 25 लाख कमाई की उम्मीद थी. लेकिन जिस तरह से ओलावृष्टि और बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाया है, उसे देखते हुए 5 लाख रुपये भी आ जाएं तो बड़ी बात होगी.

किसान नितिन चंद्र गायकवाड ने कहा कि नुकसान हो देखते हुए शासन से उम्मीद करते हैं कि उन्हें राहत दी जाए ताकि अगली फसल के लिए तैयारी कर सकें. मौजूदा हालत में तरबूज की खेती की लागत निकालना भी मुश्किल लग रहा है.
पांच एकड़ जमीन पर इस दंपति ने पूरी तरह जैविक तरीके से तरबूज की खेती की थी. उन्हें इस फसल से 20 से 25 लाख रुपये की आय की उम्मीद थी. लेकिन पिछले तीन-चार दिनों में अचानक हुई ओलावृष्टि ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया और उनका सपना टूट गया.
जैविक खेती के तहत गायकवाड परिवार दूध, बेसन, गुड़, गोबर और गोमूत्र का उपयोग करता है. उनकी फसल पूरी तरह केमिकल-फ्री और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है, इसलिए ग्राहक सीधे उनके खेत से तरबूज खरीदने आते हैं. लेकिन उनकी पूरी फसल चौपट हो गई है और अगली फसल पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
गायकवाड परिवार ने बताया कि ओलों की मार से तरबूज फट गए हैं, उनमें दरारें आ गई हैं और वे अब बेचने लायक नहीं बचे हैं. बंपर उपज और अच्छी कमाई की उम्मीद में जिस तरबूज की खेती की गई थी, वह खेती पूरी तरह से चौपट हो गई है.
किसानों के लिए खेती किसी जुए से कम नहीं है, और गायकवाड परिवार पिछले कई वर्षों से यह जोखिम उठा रहा है. इस साल जहां 100 टन उत्पादन और 18 से 20 लाख रुपये के मुनाफे की उम्मीद थी, वहीं प्रकृति की मार ने कुछ ही मिनटों में उनकी पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया. ऐसे मुश्किल समय में किसानों को सरकार से मदद की सख्त जरूरत है.
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