नांदेड़ के किसान आत्माराम टेकालेमहाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में बारिश की बेरुखी किसानों के लिए बड़ा संकट बन गई है. जिले की अर्धापुर तहसील के कई इलाकों में पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण सोयाबीन और कपास की फसलों पर बुरा असर पड़ा है. खेतों में दूर से फसल खड़ी दिखाई दे रही है, लेकिन किसानों का कहना है कि सोयाबीन की फलियों में दाने तक नहीं भर पाए हैं. खेती पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद अब किसानों के सामने लागत निकालने का संकट खड़ा हो गया है.
इसी संकट को सामने लाने वाला दाभड़ गांव के किसान आत्माराम टेकाले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. सूखी और प्रभावित सोयाबीन की फसल के बीच खड़े टेकाले ने अपने खेत की हालत दिखाते हुए सरकार और प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है. इसके साथ ही उन्होंने सरकार को खुली चुनौती भी दी है.
आत्माराम टेकाले ने अपनी फसल की स्थिति बताते हुए कहा, “आप एक किलो सोयाबीन निकालकर दिखाइए, हम सभी गांव वालों का चंदा इकट्ठा करके आपको एक क्विंटल काजू और बादाम देंगे.”
उनका दावा है कि फसल की हालत इतनी खराब है कि एक एकड़ खेत से एक किलो सोयाबीन निकलना भी मुश्किल है. पौधों पर फलियां जरूर दिखाई दे रही हैं, लेकिन उनके अंदर दाने विकसित नहीं हुए हैं. किसान की इसी चुनौती का वीडियो सामने आने के बाद किसानों की फसल और मौजूदा कृषि संकट को लेकर चर्चा तेज हो गई है.
आत्माराम टेकाले छोटे किसान हैं और दाभड़ गांव में करीब पांच एकड़ जमीन पर खेती करते हैं. परिवार की आय मुख्य रूप से इसी खेती पर निर्भर है. उनकी पत्नी कसाबाई टेकाले भी खेती के काम में उनका पूरा साथ देती हैं.
परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी हैं. बेटा ग्रेजुएशन पूरा कर चुका है, जबकि बेटी 12वीं कक्षा में साइंस की पढ़ाई कर रही है. बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार का रोजमर्रा का खर्च और खेती में अगली फसल के लिए लगने वाली पूंजी तक इसी पांच एकड़ खेत की कमाई पर निर्भर है.
लेकिन इस बार बारिश ने टेकाले परिवार की आर्थिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं. खेत में लगाई गई रकम वापस मिलने की उम्मीद भी बेहद कम हो गई है.
सोयाबीन की खेती के लिए किसान ने बीज, खाद, दवाइयों और दूसरे कृषि कार्यों पर पैसे खर्च किए. परिवार को उम्मीद थी कि फसल तैयार होने के बाद सोयाबीन बेचकर इस लागत की भरपाई हो जाएगी और परिवार के दूसरे खर्च भी निकल सकेंगे.
बारिश के साथ नहीं देने से अब पूरा आर्थिक हिसाब बिगड़ गया है. खेत में पौधे और उन पर फलियां मौजूद हैं, लेकिन फलियों के अंदर पर्याप्त दाने नहीं होने की शिकायत है.
यानी किसान के सामने दोहरा संकट है. पहले खेती तैयार करने में खर्च हुआ और अब खराब हो चुकी फसल को खेत से हटाने में भी मजदूरी और मेहनत लगेगी. आमदनी की उम्मीद बेहद कम होने के बावजूद किसान को आगे की खेती के लिए दोबारा पैसा जुटाना पड़ेगा.
आत्माराम टेकाले का गुस्सा प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को लेकर भी दिखाई दिया. उनका कहना है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि बैठकें करते हैं और फसलों की स्थिति पर चर्चा होती है, लेकिन किसानों की असली हालत जानने के लिए खेत में आकर स्थिति को देखना जरूरी है.
इसी नाराजगी के बीच उन्होंने अपनी फसल सामने रखकर सरकार से कहा कि खेत से एक किलो सोयाबीन निकालकर दिखाया जाए. टेकाले का कहना है कि उनकी चुनौती का उद्देश्य यह दिखाना है कि जमीन पर फसल की वास्तविक स्थिति क्या है और किसान किस तरह के संकट से गुजर रहा है.
किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेत को देखकर पहली नजर में नुकसान की वास्तविक गंभीरता का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है. सोयाबीन की फलियां पौधों पर मौजूद हैं, लेकिन टेकाले के मुताबिक फलियों में दाने नहीं भरने की वजह से पैदावार मिलने की संभावना बेहद कम है.
ऐसी स्थिति में किसान के सामने सिर्फ मौजूदा सीजन के नुकसान का सवाल नहीं है. अगली फसल के लिए बीज और खाद खरीदने, बच्चों की पढ़ाई जारी रखने और परिवार के रोजमर्रा के खर्च पूरे करने की चिंता भी खड़ी है.
पांच एकड़ की खेती से मिलने वाली कमाई पर निर्भर टेकाले परिवार के लिए फसल खराब होना सीधे तौर पर घरेलू अर्थव्यवस्था पर चोट है.
आत्माराम टेकाले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उनकी परेशानी अब चर्चा का विषय बन गई है. एक तरफ खेत में खड़ी फसल दिखाई दे रही है, दूसरी तरफ किसान दावा कर रहा है कि फलियों में दाना तक नहीं है.
“एक किलो सोयाबीन निकालकर दिखाओ” वाली उनकी चुनौती इसी निराशा और नाराजगी को जाहिर करती है.
टेकाले और उनका परिवार अब सरकार से जल्द राहत मिलने की उम्मीद लगाए बैठा है. उनकी मांग है कि प्रभावित इलाकों में किसानों की फसलों का वास्तविक आकलन किया जाए और नुकसान झेलने वाले किसानों को जल्द से जल्द आर्थिक मदद दी जाए.
किसान का कहना है कि समय रहते मदद नहीं मिली तो आर्थिक संकट और गंभीर हो सकता है. बच्चों की पढ़ाई, परिवार का खर्च और अगली फसल की तैयारी जैसी तमाम जिम्मेदारियों के बीच किसान को अब सरकारी सहायता का इंतजार है.
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