Explainer: दाल में 'जहर' का तड़का; फसल जल्दी सुखाने के चक्कर में मिट्टी और पानी भी प्रदूषित, सेहत पर खतरा

Explainer: दाल में 'जहर' का तड़का; फसल जल्दी सुखाने के चक्कर में मिट्टी और पानी भी प्रदूषित, सेहत पर खतरा

मध्य प्रदेश में मूंग और उड़द की फसल को जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वाट के इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके अवशेष मिट्टी और पानी तक पहुंच सकते हैं.

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Explainer: दाल में 'जहर' का तड़का; फसल जल्दी सुखाने के चक्कर में मिट्टी और पानी भी प्रदूषित, सेहत पर खतरा

खेतों में खरपतवार खत्म करने और फसल को जल्दी तैयार करने के लिए किसान कई तरह के खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल करते हैं.खरपतवार नियंत्रण में इन रसायनों की भूमिका है, लेकिन इनका इस्तेमाल सही फसल, सही मात्रा और सरकारी सिफारिश के अनुसार होना बेहद जरूरी है. जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर इनका असर खेत तक ही सीमित नहीं रहता. रसायनों के अवशेष मिट्टी, पानी और फसल तक पहुंच सकते हैं.

इसी कड़ी में पैराक्वाट के इस्तेमाल को लेकर मध्य प्रदेश में चिंता सामने आई है. खासतौर पर मूंग और उड़द की फसल को जल्दी सुखाने के लिए इसके इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं.वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी रसायन का इस्तेमाल उसकी स्वीकृत सिफारिश और तय मात्रा के अनुसार ही किया जाना चाहिए.

60-70 दिन में तैयार मूंग, जल्दी खेत खाली करने की होड़!

मध्य प्रदेश के विदिशा, रायसेन, सीहोर, हरदा और आसपास के कई जिलों में गर्मी के मौसम में मूंग की बड़े पैमाने पर खेती होती है. मूंग की फसल लगभग 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है. फसल की कटाई के बाद किसानों को खरीफ सीजन की तैयारी करनी होती है, इसलिए खेत जल्दी खाली करना जरूरी होता है.

इसी वजह से कुछ जगहों पर मूंग की फसल को जल्दी सुखाने के लिए रसायनों के इस्तेमाल की बात सामने आती रही है. पैराक्वाट पौधे के हरे हिस्से पर तेजी से असर करने वाला खरपतवारनाशक है. इसके इस्तेमाल के बाद पौधे के हिस्से सूख जाते हैं और किसान मशीन से फसल निकाल लेते हैं.यहीं से खाद्य सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा होता है कि कटाई के इतने करीब रसायन का इस्तेमाल करने पर फसल में उसके अवशेष कितने रह सकते हैं.

वैज्ञानिक कर रहे हैं पैराक्वाट के असर का अध्ययन

जबलपुर स्थित खरपतवार अनुसंधान निदेशालय की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शोभा संध्या दो दशक से ज्यादा समय से खरपतवारनाशकों के प्रभाव और उनके इस्तेमाल से जुड़े विषयों पर काम कर रही हैं.

उनके मुताबिक, पैराक्वाट जैसे रसायनों के गलत या अनुशंसित उपयोग से पर्यावरण पर असर को लेकर सावधानी जरूरी है. खेत में डाला गया रसायन मिट्टी के संपर्क में आता है और बारिश या सिंचाई की स्थिति में उसके पर्यावरणीय व्यवहार को समझना जरूरी हो जाता है.

इसके लिए वैज्ञानिक लाइसीमीटर जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर यह अध्ययन कर रहे हैं कि रसायन पानी के साथ नीचे किस तरह जाता है और कितने समय तक उसकी मौजूदगी देखी जा सकती है.

मिट्टी से भूजल तक पहुंचने की चिंता

पैराक्वाट मिट्टी के कणों से मजबूती से जुड़ने के लिए जाना जाता है. फिर भी अलग-अलग मिट्टी, मौसम, पानी और इस्तेमाल की परिस्थितियों में इसका व्यवहार अलग हो सकता है. इसलिए किसी इलाके में यह मिट्टी से पानी या भूमिगत जल तक कितना पहुंचता है, यह वैज्ञानिक जांच से ही तय किया जा सकता है.

डॉ. शोभा संध्या के अनुसार, अध्ययन में पानी में रसायन की मौजूदगी को लेकर जांच की जा रही है. इसका उद्देश्य यह समझना है कि खेतों में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों का पर्यावरण पर कितना प्रभाव पड़ सकता है.

अनाज में अवशेष को लेकर क्यों जरूरी है जांच?

खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेष की एक अधिकतम सीमा यानी MRL (Maximum Residue Limit) निर्धारित होती है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भोजन में किसी रसायन का अवशेष तय सीमा से अधिक न हो.

इसलिए यदि मूंग या उड़द में पैराक्वाट के अवशेष को लेकर कोई दावा किया जाता है तो उसके लिए लैब रिपोर्ट, नमूने की संख्या, जांच की तारीख और परीक्षण की वैज्ञानिक पद्धति सामने होना जरूरी है. केवल किसी एक आंकड़े के आधार पर पूरे क्षेत्र की फसल को असुरक्षित बताना सही नहीं होगा.

इंसानी स्वास्थ्य के लिए कितना खतरनाक?

पैराक्वाट की सबसे गंभीर चिंता इसकी विषाक्तता से जुड़ी है. बड़ी मात्रा में इसे निगलने पर शरीर के कई अंगों को गंभीर नुकसान हो सकता है। गंभीर विषाक्तता में फेफड़े, किडनी और लीवर प्रभावित हो सकते हैं.

हालांकि भोजन में मौजूद बहुत कम मात्रा के अवशेष को सीधे “स्लो प्वाइजन” कहना वैज्ञानिक रूप से सावधानी मांगता है.इसके लिए वास्तविक मात्रा, लगातार संपर्क, शरीर में पहुंचने की मात्रा और वैज्ञानिक जोखिम आकलन जरूरी होता है.

यानी सवाल यह है कि क्या खाद्य फसल में अनुशंसित उपयोग से अलग तरीके से या कटाई के बेहद करीब पैराक्वाट का इस्तेमाल अवशेष का खतरा बढ़ा सकता है? इसका जवाब लैब जांच और वैज्ञानिक मूल्यांकन से ही मिलेगा.

मछलियों पर असर का दावा भी वैज्ञानिक जांच का विषय

डॉ. शोभा संध्या के अनुसार, उनके अध्ययन में रसायन मिले पानी को एक टैंक में रखकर मछलियों पर प्रभाव देखा गया और मछलियों के मरने की बात सामने आई.हालांकि इस तरह के प्रयोग के परिणामों को व्यापक पर्यावरणीय निष्कर्ष में बदलने से पहले रसायन की मात्रा, पानी की मात्रा, संपर्क का समय और नियंत्रण समूह जैसी पूरी वैज्ञानिक जानकारी देखना जरूरी है.

उड़द की फसल में भी इस्तेमाल की बात

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर और आसपास के इलाकों में उड़द की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है. यहां भी खरपतवार नियंत्रण के लिए अलग-अलग रसायनों के इस्तेमाल की बात सामने आती है. ऐसे में किसानों को किसी भी खरपतवारनाशक का इस्तेमाल करने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित रसायन उस फसल के लिए किस उपयोग में स्वीकृत है.

किसान बरतें ये सावधानियां

किसानों को खरपतवारनाशक का इस्तेमाल केवल लेबल, सरकारी सिफारिश और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना चाहिए.कटाई के ठीक पहले किसी रसायन का इस्तेमाल करने से पहले उसकी प्रतीक्षा अवधि यानी PHI जरूर देखनी चाहिए.

रसायन की निर्धारित मात्रा से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. छिड़काव के दौरान दस्ताने, मास्क, चश्मे और सुरक्षात्मक कपड़ों का इस्तेमाल करना चाहिए. रसायन को कुएं, नलकूप या अन्य जलस्रोतों के पास नहीं रखना चाहिए और खाली बोतल या पैकेट को पानी के स्रोत में नहीं फेंकना चाहिए.

सवाल सिर्फ खरपतवार का नहीं, हमारी थाली का भी है

मूंग और उड़द जैसी खाद्य फसलों में रसायनों के इस्तेमाल को लेकर सबसे जरूरी बात है सही उपयोग और नियमित जांच.फसल जल्दी सुखाने की जल्दबाजी में अगर किसी रसायन का गलत इस्तेमाल होता है तो इसका असर फसल के साथ मिट्टी और पानी पर भी पड़ सकता है.

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