अपनी उपज को मंडी बेचने के लिए किन परेशानियों से जूझता है किसान, पढ़ें यहां

अपनी उपज को मंडी बेचने के लिए किन परेशानियों से जूझता है किसान, पढ़ें यहां

किसानों ने भी कहा कि उन्हें किसी प्रकार की मदद वेजफेड से नहीं मिली है. एपीएमसी व्यवस्था लागू तो की गई है पर मंडी या बाजार लिए जो जगह निर्धारित की गई है वहां पर सब्जी मार्केट नहीं लगता है. जिस जगह पर सब्जी मार्केट लगता और किसान अपनी सब्जियां लेकर बेचने जाते हैं वहां पर बिचौलियों को दलालों का कब्जा रहता है. 

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अपनी उपज को मंडी बेचने के लिए किन परेशानियों से जूझता है किसान, पढ़ें यहांझारखंड की सब्जी मंडी फोटोः किसान तक

एक किसान खेती में दिन रात मेहनत करता है तब जाकर खेत से सब्जियां या फल उगते हैं. फिर जब वह अपने उत्पाद बेचने के लिए बाजार में जाता है तब उसे क्या परेशानी होती है. झारखंड के किसान छोटे या बड़े हमेशा इस समस्या से दो-चार होते हैं. रांची में आयोजित किसान संवाद में बाजार की समस्या को लेकर किसानों ने अपना दर्द बयां किया. वह राज्य के किसानों की व्यथा को बताने के लिए काफी था, क्योंकि जब पढ़े लिए और जागरूक युवा किसानों के साथ अगर बाजार में परेशानी हो रही है तो उन भोले-भाले गांव के कम पढ़े लिखे किसानों और महिला किसानों के साथ क्या बीतता होगा, उन्हें किस स्तर की मानसिक पीड़ा या प्रताड़ना से गुजरना पड़ता होगा. 

किसान संवाद को संबोधित करते हुए हजारीबाग के प्रगतिशील किसान विनोद मेहता ने बताया कि उन्हें भी बाजार में परेशानी होती है. विनोद एक ऐसे किसान हैं जिन्होंने स्टार्टअप के तौर पर खेती शुरु किया है. एमबीए की पढ़ाई पूरी करने बाद लगभग आठ सालों तक बैंक में नौकरी की है. तब जाकर उन्होंने खेती शुरू की है. उन्होंने बताया की किस प्रकार वेजफेड से किसानों को कोई मदद नहीं मिलती है. एपीएमसी की व्यस्था तो इस राज्य में पर इस व्यवस्था की पूरी खोल विनोद मेहता ने खोलकर रख दी. क्योंकि उनका कहना था कि जब उनके जैसे पढ़े-लिखे किसान के साथ यह हो सकता है तो बाकी किसान किस हद तक ठगे जाते होंगे. 

दलालो के कब्जे में है सब्जी मंडी

विनोद मेहता ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्होंने वेजफेड से तरबूज बेचने के लिए संपर्क किया. लेकिन किसी प्रकार की मदद उन्हें नहीं मिली. वेजफेट एक ऐसी संस्था है जिसका गठन 1987 में हुआ था पर किसानों के लिए यह किसी काम का नहीं है. अन्य किसानों ने भी कहा कि उन्हें किसी प्रकार की मदद वेजफेड से नहीं मिली है. एपीएमसी व्यवस्था लागू तो की गई है पर मंडी या बाजार लिए जो जगह निर्धारित की गई है वहां पर सब्जी मार्केट नहीं लगता है. जिस जगह पर सब्जी मार्केट लगता और किसान अपनी सब्जियां लेकर बेचने जाते हैं वहां पर बिचौलियों को दलालों का कब्जा रहता है. 

किसानों को मिलती है सबसे कम कीमत

ई-नाम का जिक्र करते हुए पंकज राय ने कहा कि यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां पर सीधे किसानों की पहुंच नहीं है. बड़े ट्रोडर और दलाल इससे जुड़े हुए हैं, छोटे किसानों से  वही सामान खरीदते हैं और अपने नाम से अच्छी कीमत पर बेचते हैं. रामगढ़ जिले के बाजार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यहां की मंडी में अपना उत्पाद ले जाने के साथ ही किसान को सब्जी बेचकर जो पैसे मिलते हैं उसका सात प्रतिशत मंडी टैक्स के तौर पर देना प़ड़ता है. समान वजन करने और उसकी लोडिंग-अनलोडिंग का पैसा किसान को देना होता है. इस तरह से सबसे सब्जी उगाने के बाद सबसे कम कीमत किसानों को ही मिलती है. 

आदर्श मंडी बनाने की मांग

पंकज राय ने गोला मंडी का उदाहरण देते हे कहा कि यहां पर हर रोज 400-500 टन सब्जी का कारोबार होता है. यहां आने वाले अधिकांश किसान महिलाएं होती है जो अपने उत्पाद लेकर आती हैं. पर बाजार की कुव्यवस्था का आलम यह है कि यहां पर महिला किसानों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा यहां पर आने वालि महिला किसानों को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. पंकज राय ने सुझाव देते हुए कहा कि बाजार में कम से कम दो से तीन घंटे तक एक बीटीएम स्तर के अधिकारी की नियुक्ति करनी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार के परेशानी होने पर किसान अपनी शिकायत कर सकें. उन्होंने कहा कि सभी सुविधाओं से लैस आदर्श मंडी का निर्माण करना चाहिए.  

 

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