गन्ने की सिंगल बड तकनीकबिहार में गन्ना की खेती बढ़ाने और चीनी उद्योग को पटरी पर लाने के लिए कई प्रयास शुरू हो गए हैं. सरकार ने ऐलान कर दिया है कि बंद पड़ी चीनी मिलें जल्द खुलेंगी. उसके लिए जमीनी स्तर पर योजनाएं बनाने और उसे अमल में लाने का काम शुरू हो गया है. इसी कड़ी में मंगलवार को ज्ञान भवन, पटना में बिहार सरकार के गन्ना उद्योग विभाग ने “गन्ना प्रौद्योगिकी सेमिनार–2026” आयोजित किया. सेमिनार के दूसरे दिन गन्ना उत्पादन, उत्पादकता, रोग प्रबंधन, नई प्रौद्योगिकी, जलवायु-अनुकूल खेती और उद्योग के विस्तार से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और संस्थागत प्रतिनिधियों ने गंभीर मंथन किया. सेमिनार में इस बात पर जोर दिया गया कि बिहार में गन्ना क्षेत्र के विस्तार और चीनी उद्योग को नई गति देने के लिए उन्नत बीज, यंत्रीकरण, रिसर्च आधारित उपाय और क्षेत्र विशेष के अनुरूप तकनीक को प्राथमिकता देनी होगी.
तकनीकी सत्रों में बेतिया क्षेत्र की मिट्टी में 8.5 से अधिक क्षारीयता (पीएच) की समस्या पर भी विस्तार से चर्चा हुई. विशेषज्ञों ने कहा कि इस प्रकार की मिट्टी में उर्वरता बढ़ाने, भूमि की क्वालिटी सुधारने और उपयुक्त कृषि प्रबंधन अपनाने की दिशा में ठोस पहल जरूरी है. कार्यक्रम के दौरान पूसा संस्थान के 40 छात्रों के रिसर्च पेपर प्रकाशित किए गए जो गन्ने की खेती पर लिखे गए हैं. बिहार की मिट्टी में पीएच की बढ़ती मात्रा को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए पूसा में गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. डीके सिंह ने 'किसान तक' से कहा कि जहां भी रासायनिक खाद का इस्तेमाल अधिक होता है, वहां पीएच की समस्या देखी जाती है. बिहार की मिट्टी भी ऊसर हो रही है क्योंकि रासायनिक खाद अधिक डाले जा रहे हैं. गन्ने की खेती के लिए यह बड़ी समस्या है.
डॉ. सिंह ने कहा, बिहार की मिट्टी में कैल्शियम कार्बोनेट और कैल्शियम बाई कार्बोनेट के जमा होने (एक्यूमुलेशन) से पीएच बढ़ रहा है. इसके साथ ही मिट्टी की जुताई के ठीक नीचे सॉल्ट की मोटी लेयर बन गई है जिससे पानी का सही ढंग से रिसाव नहीं हो रहा है. इससे भी मिट्टी का पीएच मान बढ़ गया है. जब तक पीएच का स्तर सही नहीं होगा, तब तक गन्ने की खेती और उसकी क्वालिटी बढ़ना मुश्किल है. कार्बनिक तत्वों की मात्रा भी घट गई है जिससे उर्वरता प्रभावित हुई है.
इसके अलावा, बिहार में जलजमाव की समस्या से भी गन्ने की खेती घट रही है. उन क्षेत्रों में गन्ने की खेती अच्छी होती है जहां जलजमाव नहीं होता है. इससे निपटने का सबसे अच्छा उपाय है कि ऐसे प्रभेद (वैरायटी) लगाए जाएं जो जलजमाव को झेल सकें. गन्ने की खेती में ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित की जानी चाहिए जिससे जलजमाव की समस्या से निपटा जा सके.
इस सेमिनार में कई गन्ना किसान भी शामिल हुए. बेतिया के किसान विजय कुमार पांडेय ने कहा कि किसी भी फसल की खेती के लिए 6.5 से 7 तक पीएच होना चाहिए. गन्ने के लिए भी यही नियम है, लेकिन बिहार की मिट्टी का पीएच मान 8.5 से ऊपर चला गया है. मिट्टी में काबर्न की मात्रा घटने से भी पीएच बढ़ गया है जिससे गन्ने जैसी फसलों की उपज गिर रही है. पांडेय ने कहा, पूरे बिहार में गन्ने के एरिया में 35 परसेंट गिरावट है. कई साल से गन्ने की खेती का दायरा घट रहा है जिससे चीनी मिलों को पटरी लाने का काम मुश्किल हो रहा है. जब तक गन्ने की खेती नहीं बढ़ेगी, नई तकनीक और नई वैरायटी नहीं आएगी तब तक गन्ना और चीनी का उत्पादन आसान नहीं होगा.
विजय पांडेय ने बताया कि बड्स से गन्ने की खेती बिहार में अच्छा परफॉरमेंस दे सकती है. बिहार सरकार और वैज्ञानिक दोनों का प्रयास है कि बिहार में गन्ने की खेती बढ़े, लेकिन बड्स फार्मिंग की तकनीक किसानों तक नहीं पहुंच पा रही है. ऐसे में जब तक किसानों को आर्थिक और तकनीकी मदद नहीं दी जाती, तब तक गन्ना उत्पादन का काम मुश्किलों का सामना करता रहेगा. चीनी मिलों को पटरी पर लाने के लिए गन्ना आधारित नई तकनीक किसानों की मदद कर सकती है और बिहार फिर से गन्ने में अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकता है.
सेमिनार में इन सभी विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई. इस अवसर पर ईंख आयुक्त अनिल कुमार झा ने कहा कि गन्ना प्रौद्योगिकी सेमिनार का उद्देश्य तकनीक, शोध और नीति को खेत तक पहुंचाकर बिहार के गन्ना क्षेत्र को नई दिशा देना है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि बिहार में गन्ना विकास की बड़ी संभावनाएं हैं और इन्हें वैज्ञानिक शोध, तकनीकी विस्तार और संस्थागत सहयोग के माध्यम से मजबूत किया जा सकता है.
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. आर. विश्वनाथन ने “बिहार में गन्ना रोग परिदृश्य” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि फसल को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए सतत निगरानी, समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन रणनीति जरूरी है. शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट, कोयंबटूर के निदेशक डॉ. पी. गोविंदराज ने “गन्ना खेती में नई तकनीकें” विषय पर प्रस्तुति देते हुए कहा कि बदलती कृषि परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत खेती पद्धतियों, बेहतर रोपण सामग्री और आधुनिक तकनीक को अपनाना समय की जरूरत है.
सेमिनार में आईआईटी पटना की ओर से AI, ब्लॉकचेन और QR कोड आधारित वेरिफिकेशन प्रणाली के उपयोग की संभावनाओं पर भी जानकारी दी गई. विशेषज्ञों ने कहा कि इन तकनीकों के माध्यम से गन्ना प्रजातियों की शुद्धता और प्रमाणिकता सुनिश्चित की जा सकती है.
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