बिहार में सब्जी किसानों के सामने चुनौती बढ़ीअक्टूबर का महीना चल रहा है और इस दौरान आलू समेत अन्य सब्जियों की खेती करने वाले किसान खेतों की तैयारी में जुट गए हैं. हालांकि, कई ऐसे किसान हैं, जो सब्जियों और अन्य फसलों की खेती केवल अपने घर की जरूरत को पूरा करने के लिए कर रहे हैं. वे इसे विस्तार रूप नहीं देना चाहते. इन्हीं किसानों में कैमूर जिले के संतोष सिंह भी हैं. वह कहते हैं कि वह चाहें तो सब्जी की खेती या आलू की खेती बड़े पैमाने पर कर सकते हैं, लेकिन बाजार और सही दाम नहीं मिलने की आशंका में वह केवल अपने घर की जरूरत को ध्यान में रखकर खेती करते हैं. वहीं, रोहतास जिले के किसान अर्जुन सिंह भी उनकी बातों से अपनी रजामंदी जाहिर कर रहे हैं.
किसान संतोष सिंह कहते हैं कि सब्जी की खेती में धान और गेहूं की खेती की तुलना में अच्छी कमाई है, लेकिन सही समय पर सही दाम मिलना और सही समय पर सब्जी बिक जाना बिहार में एक बड़ी चुनौती है. मंडी का अभाव और जो भी प्राइवेट मंडियां हैं, वहां कुछ चिह्नित लोगों का दबदबा होने की वजह से सब्जी की खेती करने की इच्छा नहीं होती है.
जब उनसे पूछा गया कि अगर आप रासायनिक तरीके से सब्जी की खेती करने की जगह ऑर्गेनिक सब्जी की खेती करना चाहते हैं, तो वह कहते हैं कि ऑर्गेनिक खेती करने की इच्छा है. हमें भी पता है कि रसायनयुक्त सब्जियां खाने से लोग कई तरह के रोगों से हर रोज बीमार पड़ रहे हैं, लेकिन जब रसायनयुक्त सब्जियों के दाम आसमान पर हैं और किसान को उसका उचित दाम नहीं मिल रहा, तो ऑर्गेनिक सब्जी की खेती करके कमाई कैसे होगी, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है. इसलिए सरकार को सबसे पहले मंडी व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत है.
संतोष सिंह कहते हैं कि जैसे अब पंचायत स्तर पर भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जा रहे हैं, वैसे ही खेती को लेकर भी पंचायत स्तर पर वैज्ञानिकों की एक टीम गठित की जाए. जिस तरह से जिला स्तर पर कृषि विज्ञान केंद्र हैं, वैसे ही पंचायत स्तर पर भी इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए. इससे यह होगा कि आधुनिक खेती, सरकार की योजनाओं या खेती के अलग-अलग मॉडल से जुड़ी जानकारी हमें आसानी से मिल सकेगी.
इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन के दौर में कई तरह के रोगों का खतरा फसलों में तेजी से बढ़ा है और उन रोगों का उपचार कैसे होगा, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी आसानी से नहीं मिलती है. हमें बाजार के निजी दुकानदारों के द्वारा जो दवाएं मिलती हैं, उसी का उपयोग हम खेतों में करते हैं, जिसका असर यह होता है कि कुछ दवाएं काम करती हैं, तो कुछ दवाएं काम नहीं करतीं. इसलिए सरकार को ग्रामीण स्तर पर भी कृषि विज्ञान केंद्र जैसी व्यवस्था करने की जरूरत है.
रोहतास जिले के किसान अर्जुन सिंह कहते हैं कि किसान अपने खेतों में अलग-अलग तरह की फसलों का उत्पादन कर सकता है, लेकिन वह अपने उत्पादन को बेच नहीं सकता. अगर वह मंडियों में या बाजारों में अपनी फसल बेचने बैठेगा, तो वह खेती नहीं कर पाएगा. इसके लिए जिले स्तर पर मंडी की जो व्यवस्थाएं हैं, उनमें सुधार करने की जरूरत है.
वह कहते हैं कि मैं समूह के जरिए खेती करता हूं और मेरी सब्जियां बंगाल सहित अन्य राज्यों में जाती हैं. जैसे उत्तर प्रदेश के गोरखपुर या वाराणसी में मंडियों की व्यवस्थाएं हैं, वैसी व्यवस्थाएं बिहार की मंडियों में नहीं हैं. अगर सरकार किसानों को लेकर सीरियस है और यह मानती है कि उनकी आय को दोगुना करने के लिए सबसे पहले राज्य में मंडी कानून पर काम करने की जरूरत है.
एक बेहतर बाजार तभी उपलब्ध होगा, जब राज्य में मंडी जैसी व्यवस्थाएं होंगी, जहां किसान अपने उत्पादन को आसानी से बेचकर कुछ ही घंटे में घर वापस आ सके. अगर वह अपनी सब्जियां और अन्य फसलें मंडियों या बाजारों में बेचने बैठेगा, तो पूरा दिन बीत जाएगा और वह न तो सही से अपनी फसल बेच पाएगा और न ही खेती कर पाएगा.
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