रोहिलखंडी गायभारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), इज्जतनगर (बरेली) ने पशुधन अनुसंधान के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि हासिल की है. संस्थान द्वारा विकसित और संरक्षित रोहिलखंडी और वृन्दावनी गाय नस्लों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) द्वारा आधिकारिक रूप से पंजीकृत किया गया है. नई दिल्ली के एनएएससी कॉम्प्लेक्स स्थित ए पी शिंदे हॉल में आयोजित पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाणपत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण समारोह में यह प्रमाणपत्र प्रदान किया गया. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह प्रमाणपत्र डेयर सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. मंगी लाल जाट तथा पशुपालन एवं डेयरी विभाग की अपर सचिव वर्षा जोशी की मौजूदगी में सौंपा.
IVRI के निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त ने बताया कि दोनों नस्लों का पंजीकरण होने से इनके संरक्षण, संवर्धन और आनुवंशिक सुधार की योजनाओं को वैज्ञानिक आधार मिलेगा. साथ ही, इन नस्लों से जुड़े किसानों और पशुपालकों को सरकारी योजनाओं और सब्सिडी का सीधा लाभ मिल सकेगा. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ये नस्लें बरेली मंडल में पशुपालन की रीढ़ बन सकती हैं और पशुपालकों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी.
रोहिलखंडी गाय मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बरेली, बदायूं और पीलीभीत जिलों में पाई जाती है. इसकी अनुमानित आबादी लगभग तीन लाख है. यह एक द्विउद्देशीय देशी नस्ल है, जिसका रंग सफेद और शरीर मध्यम आकार का होता है.
रोहिलखंडी गाय औसतन 210 दिनों तक प्रतिदिन लगभग पांच लीटर दूध देने में सक्षम है. इसके नर पशु खेतों की जुताई और भार वहन में सामान्य बैलों की तुलना में अधिक सक्षम माने जाते हैं. गर्म और आर्द्र जलवायु के प्रति इसकी अनुकूलन क्षमता बेहतर है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने के कारण उपचार पर खर्च भी कम आता है.
प्रजनन क्षमता के लिहाज से यह नस्ल 8 से 10 ब्यात तक दूध उत्पादन कर सकती है. रोहिलखंडी गाय देश की 55वीं और उत्तर प्रदेश की छठी पंजीकृत गाय नस्ल बन गई है.
वृन्दावनी गाय एक सिंथेटिक नस्ल है, जिसे IVRI द्वारा वैज्ञानिक क्रॉसब्रीडिंग के जरिए विकसित किया गया है. यह देश की तीसरी पंजीकृत सिंथेटिक गाय नस्ल है. इस नस्ल का विकास एचएफ, ब्राउन स्विस और जर्सी जैसी विदेशी नस्लों तथा हरियाणा जैसी देशी नस्ल के अनुवांशिक गुणों के संयोजन से किया गया.
वर्ष 2006 में शुरू हुए इस कार्यक्रम में 10 पीढ़ियों तक इंटर-से प्रजनन के माध्यम से नस्ल के गुणों को स्थिर किया गया. वृन्दावनी गाय का रंग भूरा, काला या काले-सफेद मिश्रित हो सकता है. यह मध्यम आकार की नस्ल है, जिसका औसत दुग्ध उत्पादन एक ब्यात में 3000 से 3500 किलोग्राम तक दर्ज किया गया है.
IVRI द्वारा वृन्दावनी गायों का वितरण बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर और बदायूं जिलों में किया गया है. साथ ही, क्षेत्रीय पशुधन सुधार के लिए वृन्दावनी सांडों के वीर्य का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है. वर्ष 2009 से 2025 के बीच करीब 1,92,910 वीर्य डोज विभिन्न एजेंसियों को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं.
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