मुर्गी की फीड लागत कम करने के लिए आईएफएस प्लान तैयार किया गया है.पशुपालन हो या फिर मुर्गीपालन एक्सपर्ट की मानें तो सबसे ज्यादा लागत फीड यानि चारे पर आती है. चारे महंगा होगा तो दूध महंगा हो जाएगा. फीड महंगा हो जाएगा तो अंडे-चिकन के दाम बढ़ जाएंगे. लेकिन बकरी और मुर्गी का पालन ऐसा है जो एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं. इसे इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग सिस्टम (IFS) भी कहा जाता है. अगर इसके काम करने के तरीके पर जाएं तो इसके तहत बकरी और मुर्गी पालन करने से फीड और चारे की लागत कम हो जाती है.
खास बात ये है कि इस सिस्टम के तहत छोटे और बड़े दोनों ही पैमाने पर बकरियों और मुर्गियों का पालन किया जा सकता है. इस सिस्टम को अपनाकर आप खेत-खलिहान, फार्म हाउस और घर कहीं पर भी बकरियों संग मुर्गी पालन कर सकते हैं. और इस सिस्टम को अपनाकर आप लागत को कम कर सकते हैं.
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IFS एक्सपर्ट डॉ. अरविंद सिंह का कहना है कि इस सिस्टम के तहत एक ऐसा शेड तैयार किया जाता है जिसमे बकरी और मुर्गियां साथ में रहती हैं. दोनों के बीच फासले के तौर पर बीच में लोहे की जाली लगी रहती है. जैसे ही बकरियां सुबह चरने के लिए चली जाती हैं तो जाली में लगा एक छोटी सा गेट खोल दिया जाता है. गेट खुलते ही मुर्गियां बकरियों की जगह पर आ जाती हैं. यहां जमीन पर या लोहे के बने स्टॉल में बकरियों का बचा हुआ चारा जिसे अब बकरियां नहीं खाएंगी पड़ा होता है. इसे मुर्गियां बड़े ही चाव से खाती हैं.
हरे चारे में बरसीम, नीम, गूलर और उस तरह के आइटम भी हो सकते हैं. इसे जब मुर्गियां खाती हैं तो उन्हें कई तरह का फायदा पहुंचाता है. और साथ ही जो फिकने वाली चीज होती है उसे मुर्गियां खा लेती हैं. इस तरह से जिस मुर्गी को दिनभर में 110 ग्राम या फिर 115 ग्राम तक दाने की जरूरत होती है तो इस सिस्टम के चलते 30 से 40 ग्राम तक दाने की लागत कम हो जाती है.
डॉ. अरविंद बताते हैं कि बकरियों संग पलने वालीं मुर्गियों के लिए प्रोटीन की भी कोई कमी नहीं रहती है. करना ये होगा कि पानी का एक छोटा सा तालाब बना लें. इसका साइज मुर्गियों की संख्या पर भी निर्भर करता है. इसकी गहराई भी बहुत कम ही होती है. इसमे थोड़ी सी मिट्टी डालने के साथ ही बकरियों की मेंगनी मिला दें. साइज के हिसाब से मिट्टी और मेंगनी का अनुपात भी तय किया जाता है.
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