स्वदेशी गौसॉर्ट तकनीक से बढ़ी बछियों की संख्या, डेयरी क्षेत्र में आ रहे नए बदलाव

स्वदेशी गौसॉर्ट तकनीक से बढ़ी बछियों की संख्या, डेयरी क्षेत्र में आ रहे नए बदलाव

गौसॉर्ट तकनीक का इस्तेमाल अब बड़े स्तर पर शुरू हो चुका है और इसे अलग-अलग राज्यों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है. इस तकनीक से किसानों को अब ज्यादा सटीक और बेहतर प्रजनन सेवाएं मिल रही हैं.

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स्वदेशी गौसॉर्ट तकनीक से बढ़ी बछियों की संख्या, डेयरी क्षेत्र में आ रहे नए बदलावगौसॉर्ट तकनीक

देशभर में गौसॉर्ट तकनीक (स्वदेशी जेंडर सॉर्टेड सीमेन) से बछियों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है, जो डेयरी क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव का संकेत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अक्टूबर 2024 में लॉन्च की गई गौसॉर्ट तकनीक अब पशु प्रजनन के क्षेत्र में तेजी से अपनी पहचान बना रही है. इस तकनीक को राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड द्वारा पशुपालन और दुग्ध उत्पादन विभाग, भारत सरकार के सहयोग से विकसित किया गया है. राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत संचालित यह पहल एनडीडीबी डेयरी सर्विसेज़ द्वारा चलाई  जा रही है, जिसका उद्देश्य बेहतर नस्ल के पशु तैयार करना, दूध उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आय को लंबे समय के लिए मजबूत बनाना है.

पशुओं की नस्ल सुधार में कारगर

गौसॉर्ट तकनीक का इस्तेमाल अब बड़े स्तर पर शुरू हो चुका है और इसे अलग-अलग राज्यों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है. इस तकनीक से किसानों को अब ज्यादा सटीक और बेहतर प्रजनन सेवाएं मिल रही हैं, जिससे पशुओं की क्वालिटी सुधर रही है और डेयरी को ज्यादा व्यवस्थित और भरोसेमंद बनाया जा रहा है.

91 प्रतिशत बछियों का हुआ जन्म

प्रोजेक्ट गिर वाराणसी के तहत इस तकनीक से अच्छे परिणाम मिल रहे हैं. अभी तक इसमें लगभग 91 प्रतिशत बछियों का जन्म हुआ है, जो इस तकनीक की सफलता को दिखाता है. जब ये बछिया बड़ी होंगी, तो किसानों को डेयरी व्यवसाय में फायदा मिलेगा. इससे उनकी आमदनी बढ़ेगी और वे आर्थिक रूप से मजबूत बनेंगे.

भारत के डेयरी क्षेत्र भविष्य है गौसॉर्ट

इस संदर्भ में एनडीडीबी के अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह ने कहा कि गौसॉर्ट सिर्फ एक तकनीक नहीं है बल्कि यह भारत के डेयरी क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा देने वाला एक सशक्त माध्यम है. यह किफायती तकनीक किसानों को अधिकांश रूप से बछिया देने के साथ उन्हें बेहतर उत्पादन, स्थिर आय और मजबूत पशुधन की ओर ले जा रही है. राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत इसका विस्तार देशभर में एक नई डेयरी क्रांति का आधार बन रहा है. प्रोजेक्ट गिर वाराणसी के परिणाम यह स्पष्ट करते हैं कि जब आधुनिक तकनीक सही तरीके से गांवों तक पहुंचती है, तो वह न केवल उत्पादन बढ़ाती है बल्कि किसानों के जीवन में स्थायी और सकारात्मक बदलाव भी लाती है.

इन जिलों में गौसॉर्ट तकनीक का इस्तेमाल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में भी गौसॉर्ट तकनीक का असर साफ दिख रहा है. मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, बुलंदशहर, हापुड़ और शामली में इस तकनीक के प्रयोग से जन्में पशुओं में 91 प्रतिशत बछिया हैं. यह आंकड़ा इस तकनीक विश्वसनीयता को मजबूत करता है और यह दिखाता है कि स्वदेशी गौसॉर्ट तकनीक डेयरी क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने की दिशा में काम कर रही है, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय और गांव की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बना रही है.  

गौसॉर्ट का उपयोग करने वाले वाराणसी के राजवीर बताते हैं कि गौसॉर्ट तकनीक की मदद से मुझे कईं बछिया मिली हैं. पहले हमें नहीं पता होता था कि बछड़ा होगा या बछिया लेकिन अब हमें पता है कि अधिकतर संभावनाएं बछिया की ही हैं. इससे आगे चलकर दूध देने वाले पशु बढ़ेंगे और हमारी आमदनी भी बढ़ेगी. इस तकनीक से हमारे डेयरी के काम में काफी मुनाफा होने लगा है. 

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