
समुद्र का पानी गर्म हो रहा है. समुद्री सतह हो या फिर गहराई, उससे जुड़ी रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली हैं. मौसम एक्सपर्ट कह रहे हैं कि समुद्र का इतना गर्म पानी तो कभी नहीं देखा गया. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (फिशरीज साइंस) तो कई साल पहले इस बारे में एक चेतावनी भरी रिपोर्ट जारी कर चुका है. तब भी इसका बड़ा कारण अलनीनो को बताया गया था और आज भी मौसम एक्सपर्ट डॉ. एसएन पांडे इसे अलनीनो से जोड़कर बता रहे हैं. एक्सपर्ट कह रहे हैं कि अगर वक्त रहते इस परेशानी पर गौर नहीं किया गया तो ये और बढ़ सकती है.
बेशक क्लाइमेट चेंज को लेकर अभी उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है जितनी की जरूरत है. लेकिन खतरे की घंटी बज चुकी है. असर सिर्फ खेती-किसानी ही नहीं पशुपालन और आम इंसानों की जिंदगी पर भी पड़ेगा. समुद्र भी इससे अछुता नहीं रहा है. समुद्र में पलने वाली मछलियों पर भी क्लाइमेट चेंज का असर होने लगा है. समुद्री मछलियां अपनी तय जगह छोड़ रही हैं. वजन भी घट रहा है और साइज में भी छोटी होती जा रही हैं.
फिश एक्सपर्ट की मानें तो समुद्र हो या फिर नदी-तालाब, हर जगह मछलियों के रहने की एक जगह होती है. वैराइटी के हिसाब से मछलियां समुद्र, नदी और तालाब में भी अलग-अलग जगह पर रहती हैं. जैसे कोई खास वैराइटी तली में रहना पसंद करती है तो कोई तली और सतह के बीच में. वहीं कुछ ऐसी भी होती हैं जो सतह पर ही रहना पसंद करती हैं.
हाल ही में डीडीजी जेके जैना ने कॉन्क्लेव के दौरान बताया कि कलाइमेट चेंज का असर इतना होने लगा है कि मछलियां अब अपनी जगह को छोड़ने लगी हैं. जैसे समुद्र की सतह पर रहने वाली मछलियां ने सतह को छोड़ना शुरू कर दिया है. एक खास प्रजाति की मछली सतह पर रहती थी. लेकिन अब ये 50 मीटर गहरे पानी में पकड़ी जा रही है. ये एक बड़ा और खतरनाक संकेत है.
डीडीजी जेके जैना ने बताया कि क्लाइमेट चेंज के चलते समुंद्री सतह का तापमान बढ़ रहा है. इसके चलते मछलियों की फेनोलॉजी पर प्रभाव पड़ रहा है. इसी बड़ी वजह के चलते कुछ मछलियों का वजन और साइज घट रहा है. जैसे बॉम्बे डक प्रजाति 232 एमएम से घटकर 192 एमएम जैसे छोटे आकार में मैच्योर हो रही है. और अगर वजन की बात करें तो पहले सिल्वर पॉम्फ्रेट 410 ग्राम के आकार में मैच्योंर होता था, लेकिन अब 280 ग्राम पर मैच्योर हो रहा है. ऐसे ही समुद्री झींगा की लंबाई में भी कमी देखी गई है.
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