जई की खेतीअल नीनो को लेकर चर्चाएं हो रही हैं. पशुपालन में चर्चा इसलिए भी हो रही है कि इसका असर चारा उत्पादन पर देखने को मिल सकता है. लेकिन हरे चारे की कमी और महंगे होने की परेशानी कोई नई नहीं है. सिर्फ हरे चारे की ही बात करें तो इसके दाम 25 से 30 फीसद तक बढ़ चुके हैं. फोडर एक्सपर्ट की मानें तो बात सिर्फ अल नीनो के असर की नहीं है, हरे चारे के लिए स्थायी समाधान पर चर्चा करने की जरूरत है. जैसे चारे की ऐसी वैराइटी हो जो साल के 12 महीने पशुओं को खिलाने के लिए मिले. ऐसी ही एक वैराइटी जई की है. इस वैराइटी को खेत में हरे चारे के लिए लगाया तो ये पूरे साल हर मौसम में मिलेगी.
साथ ही इसे खाकर पशु का शारीरिक विकास भी होगा और पशु ज्यादा से ज्यादा दूध भी देगा. इस खास वैराइटी को तैयार करने वाले साइंटिस्ट का दावा है कि उत्तर भारत के खास चार राज्यों में जई की ये वैराइटी पशुपालन को ही बदल देगी. उनका दावा है कि अगर ये चारा पशुओं को खिलाया जाता है तो इससे पशु की ग्रोथ भी होगी और दूध उत्पादन भी बढ़ेगा. एचएयू के चारा विभाग द्वारा तैयार की गई हरे चारे में ये जई की नई उन्नत किस्म एचएफओ 906 है.
फोडर एक्सपर्ट का कहना है कि जई की नई उन्नत किस्म एचएफओ 906 किस्म में प्रोटीन की मात्रा और पाचनशीलता अधिक होने के कारण ये पशुओं के लिए बहुत अच्छा हरा चारा है. देश में 11.24 फीसद हरे और 23.4 फीसद सूखे चारे की कमी को देखते हुए ही जई की इस नई किस्म को तैयार किया गया है. क्योंकि चारे की कमी के चलते पशुओं की उत्पादकता कम हो रही है.
जई चारे की अधिक गुणवत्तापूर्ण और ज्यादा पैदावार देने वाली किस्में विकसित होने से पशुपालकों को इसका बड़ा फायदा होगा और पशुओं की उत्पादकता भी बढ़ेगी. साथ ही एचएफओ 906 किस्म राष्ट्रीय स्तर की चैक किस्म कैंट और ओएस (6) 14 फीसद तक ज्यादा हरे चारे की पैदावार देती है. जई की एचएफओ 906 एक कटाई वाली किस्म है.
एक्सपर्ट का कहना है कि जई की एचएफओ 906 किस्म को देश के उत्तर-पश्चिमी जोन (हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उतराखंड) के लिए समय पर बिजाई हेतु खासतौर पर अनुमोदित की गई है. उनका कहना है कि एचएयू द्वारा विकसित की गई फसलों की किस्मों का न केवल हरियाणा बल्कि देश के अन्य राज्यों के किसानों को भी खूब फायदा मिल रहा है. चारे की विकसित किस्मों की मांग दूसरे प्रदेशों में भी लगातार बढ़ती जा रही है. यह हमारे एचएयू और हरियाणा के लिए गर्व की बात है. उन्होंने इस उपलब्धि के लिए चारा अनुभाग के वैज्ञानिकों को बधाई दी और भविष्य में भी अपने प्रयास जारी रखने का आह्वान किया.
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