कुत्ते के काटने के एक महीने बाद बच्ची की मौत. (Photo: Representational)छुट्टा घूमने वाले कुत्ते तो पहले से ही आफत बने हुए हैं. गली-मोहल्ले और सड़क कहीं भी ये हमला कर देते हैं. आतंक इतना ज्यादा बढ़ चुका है कि कुत्तों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. लेकिन अब कुत्तों संग बंदर भी आफत बन गए हैं. शहर ही नहीं गांवों में भी कुत्तों के साथ ही बंदर भी आंक्रामक हो गए हैं. शहर के साथ ही अब गांवों से भी कुत्तों और बंदरों के काटने की खबरें आ रही हैं. हर साल केन्द्र की आने वाली रिपोर्ट में कुत्तों द्वारा इंसानों पर हमले किए जाने के आंकड़े बढ़ रहे हैं. हालांकि साल 2023 के मुकाबले 2024 के आंकड़ों में कमी आई है. लेकिन मौजूदा आंकड़ा भी खासा चौंकाने वाला है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो कुत्ते आक्रमक हो रहे हैं.
सरकार के ही एक आंकड़े के मुताबिक विश्व में रेबीज से होने वाली मौतों में से 36 फीसद भारत में हो रही हैं. कुत्तों के हमले और काटने के मामले भी बढ़ रहे हैं. हालांकि डॉग स्पेशलिस्ट और गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (गडवासु), लुधियाना में मेडिसिन हैड डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा के मुताबिक अगर छोटे-छोटे तीन-चार काम किए जाएं तो गली के कुत्ते कभी नहीं काटेंगे.
केन्द्रीय पशुपालन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में 21.95 लाख लोगों को कुत्तों द्वारा काटने के मामले सामने आए हैं. इसके साथ ही इसके साथ बंदर और अन्य पशुओं द्वारा काटने के पांच लाख मामले दर्ज किए गए हैं. अगर बीते साल के आंकड़ों पर भी नजर डालें तो कुत्तों द्वारा काटने के मामले में कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है. साल 2023 में ही 30 लाख लोगों को कुत्तों ने काटा था. वहीं साल 2022 की बात करें तो 22 लाख केस सामने आए थे. 2021 के मुकाबले कुत्तों द्वारा काटने के मामले में 2022 में बढ़ोतरी हुई थी. 2021 में 17 लाख मामले सामने आए थे. जबकि 2022 में 21.80 लाख मामले दर्ज किए गए थे. जबकि साल 2018 से 2020 तक के आंकड़ों पर नजर डाले तो वो नंबर बहुत ज्यादा है. 2018 में 75 लाख, 2019 में 72 लाख और 2020 में 46 लाख केस दर्ज किए गए थे.
डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा का कहना है कि खासतौर पर गर्मी के मौसम में कुत्ते बहुत आक्रामक हो जाते हैं. उसकी वजह ये है कि 40 से 45 डिग्री तापमान होने पर उनकी यह गर्मी और बढ़ जाती है. इंसानों की तरह से कुत्तों की गर्मी पसीने की तरह से नहीं निकलती है. मुंह के रास्ते ली जाने वाली सांस से वो अपने शरीर की गर्मी को मेंटेन करते हैं. जब गर्मी बहुत बढ़ जाती है तो ऐसा करने में उन्हें बहुत तकलीफ होती है. इसके चलते उनके अंदर चिढ़ चिढ़ापन आ जाता है.
आसपास घने पेड़ न होने के चलते उन्हें छांव भी नहीं मिल पाती है. घर के आसपास ठंडी जगह में हम उन्हें बैठने नहीं देते हैं. कार के नीचे बैठें तो हम उन्हें मारने लगते हैं. ऐसे वक्त न तो उन्हें खाना ही मिल पाता है और ना ही पानी. ऐसा भी नहीं होता है कि कोई उनके बदन पर पानी डाल दे तो उन्हें कुछ राहत मिले. जागरुकता की कमी के चलते लोग गली के कुत्तों की परेशानी को समझ नहीं पाते हैं.
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