2026 में El Nino का असर, भारत में कमजोर मॉनसून और सूखे का खतरा बढ़ा

2026 में El Nino का असर, भारत में कमजोर मॉनसून और सूखे का खतरा बढ़ा

2026 में मजबूत El Nino के उभरने की संभावना जताई गई है, जिससे एशिया में सूखा और गर्मी बढ़ सकती है, जबकि अमेरिका में बारिश ज्यादा हो सकती है. इसका असर कृषि और मॉनसून पर भी पड़ेगा.

भारत में अल नीनो का असरभारत में अल नीनो का असर
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Apr 24, 2026,
  • Updated Apr 24, 2026, 6:04 PM IST

दुनिया भर के मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 के दूसरी छमाही में एक मजबूत अल नीनो मौसम की घटना उभरेगी, जिससे एशिया के ज्यादातर हिस्सों में ज्यादा गर्मी और सूखा पड़ने का खतरा होगा, जबकि उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कुछ हिस्सों में बारिश बढ़ जाएगी.

मौसम विशेषज्ञों का क्या अनुमान है

जापान के मौसम विभाग का कहना है कि दुनिया के उत्तरी हिस्से में गर्मियों के दौरान अल नीनो के उभरने की 70% संभावना है, जबकि भारतीय मौसम अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशियाई देशों में मॉनसून का मौसम तीन साल में पहली बार औसत से कम रह सकता है.

चीन के मौसम अधिकारियों को उम्मीद है कि मई में उभरने के बाद अल नीनो की स्थितियां साल के अंत तक बनी रहेंगी. U.S. क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर को मई से जुलाई के बीच अल नीनो की 61% संभावना दिख रही है.

ऑस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञान ब्यूरो मई और अगस्त के बीच औसत से कम बारिश का अनुमान लगा रहा है. ये वही समय है जब खरीफ सीजन की फसलें लगाई जाती हैं.

स्विट्जरलैंड स्थित मौसम कंपनी Meteomatics के मौसम विज्ञानी क्रिस हाइड ने 'रॉयटर्स' से कहा कि मौसम के मॉडल बता रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत में बारिश औसत से कम और तापमान औसत से ज्यादा रहेगा.

उन्होंने आगे कहा, "कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि इस साल U.S. मिडवेस्ट में फसल उगाने के लिए स्थितियां बहुत अच्छी रहेंगी।" "हमें अल नीनो के समय पर नजर रखनी होगी, कटाई के समय ज्यादा नमी की वजह से कुछ असर पड़ सकता है."

अल नीनो और ला नीना मौसम की घटनाएं क्या हैं?

अल नीनो मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान के अचानक अधिक गर्म होने का एक प्राकृतिक पैटर्न है.

यह पैटर्न तब बनता है जब वायुमंडल के दबाव में बदलाव के कारण आमतौर पर स्थिर रहने वाली पूर्वी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, या यहां तक कि उलट जाती हैं, जिससे पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में जमा हुआ गर्म पानी पूरब की ओर बहने लगता है. इससे गर्मी फैलती है और दुनिया भर के मौसम के पैटर्न बदल जाते हैं.

ला नीना तब बनता है जब हवाएं मजबूत हो जाती हैं, जिससे ज्यादा गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की ओर धकेला जाता है और पूरब में ठंडा पानी ऊपर की ओर आने लगता है. इससे समुद्र की सतह का तापमान औसत से नीचे चला जाता है.

ला नीना अक्सर ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में औसत से ज्यादा बारिश लाता है, लेकिन भारतीय मॉनसून पर इसका असर अलग-अलग तरह का होता है, न कि हमेशा एक जैसा मजबूत करने वाला. अमेरिका में, ला नीना की वजह से उत्तरी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में ज्यादा बारिश होती है और दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में सूखा पड़ता है. कुल मिलाकर, अमेरिका का ज्यादातर हिस्सा सूखा हो जाता है.

ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग के अनुसार, अल नीनो औसतन हर तीन से पांच साल में एक बार आता है और ला नीना हर तीन से सात साल में एक बार आता है.

पिछले अल नीनो घटनाओं का क्या असर हुआ था?

अल नीनो घटनाओं की गंभीरता और असर अलग-अलग होता है. 2015 और 2016 में आई एक तेज अल नीनो घटना की वजह से ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में भयंकर सूखा पड़ा, जबकि भारतीय मॉनसून कमजोर हो गया. इसकी वजह से अनाज, पाम ऑयल और चीनी का उत्पादन कम हो गया. इसी समय, दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में बहुत ज्यादा बारिश होने से सोयाबीन और मक्का की फसलें खराब हो गईं.

2009 और 2010 में आई एक मध्यम अल नीनो घटना की वजह से सूखा मौसम रहा, जिससे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में मुख्य फसलों - धान और गेहूं - का उत्पादन कम हो गया.

रिकॉर्ड के अनुसार, अब तक की सबसे तेज अल नीनो घटना 1997-1998 में हुई थी. इसकी वजह से एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ा और धान का उत्पादन बहुत कम हो गया, हालांकि भारत में औसत बारिश हुई. अमेरिका में बाढ़ आने से फसलों को नुकसान पहुंचा. एक तेज ला नीना घटना का सबसे हालिया उदाहरण 2020 से 2023 के बीच देखने को मिला.

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