
खेती में किसान की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ फसल उगाना नहीं, बल्कि उसे सही दाम पर बेचना भी है. कई बार मंडी में फसल की कीमत इतनी कम हो जाती है कि किसान को अपनी उपज लागत से भी कम दाम पर बेचनी पड़ती है. ऐसी स्थिति से किसानों को बचाने और उनकी आय को सहारा देने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी PM-AASHA चला रही है.
इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी फसल का उचित दाम दिलाना और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP को प्रभावी तरीके से लागू करना है. योजना के तहत खास तौर पर दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद की जाती है. इसके अलावा जब कुछ जरूरी फसलों की कीमत अचानक गिर जाती है, तो सरकार बाजार में हस्तक्षेप करके किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को राहत देने की कोशिश करती है.
केंद्र सरकार ने सितंबर 2018 में पीएम-आशा योजना शुरू की थी. इसका उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना था. साथ ही सरकार यह भी चाहती है कि बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव न हो. पीएम-आशा के जरिए अलग-अलग योजनाओं को एक साथ जोड़ा गया है. बाजार में फसल की कीमत और स्थिति को देखते हुए इन योजनाओं का इस्तेमाल किया जाता है. अगर बाजार भाव MSP से नीचे चला जाता है, तो किसानों को सरकारी खरीद या मूल्य अंतर भुगतान जैसी व्यवस्था का लाभ मिल सकता है. इससे किसानों को मजबूरी में अपनी फसल सस्ते दाम पर बेचने से बचाने में मदद मिलती है.
पीएम-आशा के तहत मूल्य समर्थन योजना यानी PSS सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था है. इसके तहत जब बाजार में दालों, तिलहन या खोपरा की कीमत MSP से नीचे चली जाती है, तो सरकार MSP पर किसानों से फसल खरीद सकती है.
यह खरीद राज्य सरकारों के अनुरोध पर नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के माध्यम से की जाती है. इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता है, क्योंकि उन्हें अपनी फसल बेहद कम कीमत पर बेचने की मजबूरी कम होती है.
2024-25 से दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद के लिए सामान्य तौर पर राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत तक खरीद की अनुमति है. हालांकि, देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात कम करने के लिए तुअर, उड़द और मसूर की खरीद राज्य के उत्पादन के 100 प्रतिशत तक की जा सकती है.
पीएम-आशा का काम केवल किसानों से फसल खरीदना ही नहीं है. इसके तहत मूल्य स्थिरीकरण कोष यानी PSF भी काम करता है. इसका उद्देश्य प्याज, आलू और दाल जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकना है.
जब इन वस्तुओं की कीमत बहुत कम होती है, तब उनकी खरीद कर स्टॉक बनाया जा सकता है. बाद में जब बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो इस स्टॉक को बाजार में उतारने की कोशिश की जाती है. इससे कीमतों को नियंत्रित करने और आम लोगों को महंगाई से राहत देने में मदद मिलती है.
पीएम-आशा में मूल्य अंतर भुगतान योजना यानी PDPS भी शामिल है. इसमें सरकार किसान की पूरी फसल खरीदने के बजाय MSP और बाजार में मिले वास्तविक भाव के बीच का अंतर किसान को देती है. यह पैसा सीधे किसान के बैंक खाते में भेजा जाता है. यह व्यवस्था मुख्य रूप से तिलहन के लिए इस्तेमाल की जाती है. भुगतान MSP के अधिकतम 15 प्रतिशत तक हो सकता है.
इस व्यवस्था से किसानों को MSP का सुरक्षा कवच मिलता है और सरकार को बड़ी मात्रा में फसल खरीदकर रखने के लिए बहुत बड़े भंडारण की जरूरत भी नहीं पड़ती.
टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलें जल्दी खराब हो जाती हैं. इनकी कीमतों में अचानक बड़ी गिरावट आने पर किसानों को काफी नुकसान हो सकता है. इन फसलों पर MSP भी लागू नहीं होता. ऐसी स्थिति में बाजार हस्तक्षेप योजना यानी MIS काम आती है. जब इन उत्पादों की कीमत पिछले सामान्य सीजन के मुकाबले कम से कम 10 प्रतिशत गिर जाती है, तो योजना के तहत सरकार बाजार में हस्तक्षेप कर सकती है.
नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के जरिए खरीद और दूसरी सहायता दी जाती है. इससे खासकर बंपर उत्पादन के समय किसानों को राहत मिल सकती है, जब बाजार में फसल की आवक बहुत ज्यादा होने से भाव गिर जाते हैं.
सरकार ने पीएम-आशा के लिए बजट भी बढ़ाया है. वर्ष 2024-25 में योजना पर वास्तविक खर्च 5,437.99 करोड़ रुपये रहा था. 2025-26 में इसके लिए 6,941.36 करोड़ रुपये का बजट रखा गया. अब 2026-27 में इसे बढ़ाकर 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है. बजट में यह बढ़ोतरी बताती है कि सरकार किसानों को फसल की कीमत को लेकर सुरक्षा देने और खरीद व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दे रही है.
MSP किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें फसल के लिए एक तय मूल्य का भरोसा देता है. वर्ष 2026-27 में कई फसलों का MSP उनकी उत्पादन लागत से ऊपर रखा गया है. उदाहरण के तौर पर सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि MSP 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है. यानी लागत से 814 रुपये अधिक. पीले सोयाबीन की लागत 3,805 रुपये और MSP 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है.
गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि MSP 2,585 रुपये है. यानी दोनों के बीच 1,346 रुपये का अंतर है. जूट की लागत 3,662 रुपये और MSP 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है, जिससे 2,293 रुपये का अंतर बनता है.
सरकार ने पीएम-आशा की खरीद प्रक्रिया में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया है. किसानों का बायोमेट्रिक और आधार आधारित प्रमाणीकरण किया जा रहा है. पहले से पंजीकृत किसानों से सीधे खरीद की व्यवस्था भी शुरू की गई है.
इसके अलावा ई-नाम, ई-समृद्धि और ई-संयुक्ति जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म खरीद प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और आसान बनाने में मदद कर रहे हैं. इसका उद्देश्य सही किसान तक योजना का लाभ पहुंचाना है.
बिहार में पीएम-आशा के तहत मसूर की खरीद को मजबूत किया गया है. एनसीसीएफ के जरिए पहली बार संगठित तरीके से मसूर की खरीद शुरू की गई है. इसके लिए 48 PACS और FPO को जोड़ा गया है.
10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 1,042.65 मीट्रिक टन मसूर खरीदी. इसमें 358 किसानों का पंजीकरण हुआ और 285 किसानों को लाभ मिला. इसी दौरान नेफेड ने 1,814.13 मीट्रिक टन मसूर खरीदी और 455 किसानों को इसका लाभ मिला.
छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा के तहत चना, मसूर और सरसों की खरीद की जा रही है. 10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 18,392.228 मीट्रिक टन चना, 22.231 मीट्रिक टन मसूर और 1,035.0205 मीट्रिक टन सरसों खरीदी. इस दौरान 21,721 किसानों का पंजीकरण हुआ और 13,790 किसानों को लाभ मिला. वहीं नेफेड ने 17,020.65 मीट्रिक टन चना और 355.05 मीट्रिक टन मसूर खरीदी.
पीएम-आशा का मकसद किसानों को सिर्फ सरकारी खरीद का फायदा देना नहीं, बल्कि उन्हें बाजार में कीमत को लेकर सुरक्षा देना है. जब फसल का भाव गिरता है तो खरीद, मूल्य अंतर भुगतान और बाजार हस्तक्षेप जैसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए सहारा बन सकती हैं.
सरकार डिजिटल तकनीक, ई-नाम, भंडारण और कृषि अवसंरचना को मजबूत करके खेत से बाजार तक की व्यवस्था सुधारने पर भी काम कर रही है. पीएम-आशा के जरिए कोशिश यही है कि किसान को उसकी मेहनत का उचित दाम मिले और उसे मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचने की स्थिति का सामना न करना पड़े.
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