
मध्यप्रदेश में खेती के बदलते स्वरूप की एक शानदार तस्वीर धार जिले के बदनावर विकासखंड के ग्राम रूपाखेड़ा में देखने को मिल रही है.कभी गेहूं, चना, मक्का और सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाला यह गांव आज ‘मध्यप्रदेश का मिनी हॉलैंड’ बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यहां किसान पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस जैसी आधुनिक तकनीकों के जरिए गुलाब, जरबेरा, लिलियम, जिप्सोफिला, ब्लू डेजी और व्हाइट डेजी जैसे उच्च गुणवत्ता वाले फूलों के साथ उन्नत किस्म की सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं.
करीब 1,930 की आबादी और 391 परिवारों वाले रूपाखेड़ा में लगभग एक दशक पहले तक अधिकांश किसान पारंपरिक खेती पर निर्भर थे.मौसम की अनिश्चितता, उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी और सीमित आमदनी के कारण किसानों के सामने आर्थिक चुनौतियां बनी रहती थीं. ऐसे समय में उद्यानिकी विभाग की पहल ने गांव की खेती की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई.
किसानों को संरक्षित खेती (Protected Cultivation) की तकनीक से जोड़ने के लिए उद्यानिकी विभाग ने उन्हें पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस के माध्यम से खेती के फायदे बताए. तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलने के बाद किसानों ने धीरे-धीरे पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर फूलों और सब्जियों की व्यावसायिक खेती शुरू की.
आज रूपाखेड़ा में करीब 1,44,407 वर्गमीटर क्षेत्रफल में 44 पॉलीहाउस संचालित हो रहे हैं.इनमें गुलाब, जरबेरा, लिलियम, जिप्सोफिला समेत कई उच्च गुणवत्ता वाले फूलों का उत्पादन किया जा रहा है. वहीं करीब 42,000 वर्गमीटर क्षेत्र में 13 शेडनेट हाउस बनाए गए हैं, जहां उन्नत किस्मों की सब्जियों का उत्पादन हो रहा है.
पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस में खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फसलों को काफी हद तक नियंत्रित वातावरण मिलता है. इससे मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का प्रभाव कम होता है और फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है. इसके साथ ही पानी और उर्वरकों का संतुलित उपयोग, कीट एवं रोग नियंत्रण और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में भी मदद मिलती है.
फूलों की गुणवत्ता बेहतर होने से किसानों को बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ी है.आधुनिक पैकिंग और बेहतर विपणन व्यवस्था ने भी किसानों को अपने उत्पाद का अधिक लाभकारी मूल्य दिलाने में मदद की है.
रूपाखेड़ा में संरक्षित खेती को बढ़ावा देने में केंद्र सरकार की मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) योजना का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है.योजना के तहत किसानों को पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस जैसी संरचनाएं स्थापित करने के लिए अनुदान का प्रावधान है.
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, योजना के तहत पॉलीहाउस निर्माण के लिए प्रति इकाई 19 लाख रुपये तक और शेडनेट हाउस के लिए 14.20 लाख रुपये तक अनुदान का प्रावधान किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने में मदद कर रहा है.
रूपाखेड़ा के किसानों ने यह साबित किया है कि खेती में तकनीक और फसल विविधीकरण को अपनाकर आमदनी के नए रास्ते खोले जा सकते हैं.खुले खेतों में पारंपरिक फसलों की तुलना में संरक्षित वातावरण में फूलों और सब्जियों की खेती किसानों को बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन करने का अवसर देती है.
आज गांव में तैयार होने वाले फूल और सब्जियां केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहतर गुणवत्ता और व्यावसायिक उत्पादन के कारण व्यापक बाजार तक पहुंच बनाने की क्षमता रखते हैं.
रूपाखेड़ा की कहानी केवल एक गांव की सफलता नहीं, बल्कि बदलती कृषि व्यवस्था की तस्वीर है.वैज्ञानिक तकनीक, उद्यानिकी विभाग का मार्गदर्शन, सरकारी योजनाओं का लाभ और किसानों की मेहनत मिलकर गांव को आधुनिक खेती के नए मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे हैं.
केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं है. किसान आधुनिक तकनीक, संरक्षित खेती और बाजार की मांग के अनुरूप फसल चयन करके अपनी आय बढ़ाने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकते हैं. यही वजह है कि धार जिले का यह गांव अब ‘मध्यप्रदेश का मिनी हॉलैंड’ कहलाने की पहचान बना रहा है.