
प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सियासत तेज है. किसान और राजनीतिक दल इस पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. राष्ट्रीय जनता दल के सांसद और संसद की कृषि स्थायी समिति के सदस्य सुधाकर सिंह ने इस समझौते को भारतीय किसानों के लिए “मौत का फरमान” बताते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि किसानों और उनके संगठनों से बिना सलाह किए इस समझौते को आगे बढ़ाया जा रहा है, जो बेहद खतरनाक है.
सुधाकर सिंह ने कहा कि अगर इस ट्रेड डील में कृषि क्षेत्र के लिए ठोस सुरक्षा प्रावधान नहीं जोड़े गए तो देशभर में बड़ा किसान आंदोलन खड़ा होगा. उन्होंने साफ कहा कि विरोध सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ी तो सड़कों से लेकर दिल्ली तक आंदोलन किया जाएगा. उन्होंने दावा किया कि किसान संगठनों में इस मुद्दे को लेकर गहरी बेचैनी है.
सांसद ने तर्क दिया कि रक्षा या ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में आयात की जरूरत हो सकती है, लेकिन कृषि को उसी नजरिए से देखना देश की खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका के साथ खिलवाड़ होगा. उन्होंने 1965-67 के खाद्य संकट का जिक्र करते हुए कहा कि आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को कमजोर करना भारी जोखिम है.
पिछले व्यापार समझौतों का उदाहरण देते हुए सिंह ने कहा कि ASEAN देशों के साथ हुए समझौते के बाद खाद्य तेलों के आयात में उछाल आया, जिससे घरेलू किसान बुरी तरह प्रभावित हुए. दक्षिण भारत में रबर उत्पादकों की दुर्दशा भी इसी नीति का नतीजा रही है. उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते किसानों के हित में नहीं रहे हैं और पहले से ही विश्व व्यापार संगठन का ढांचा मौजूद है.
उन्होंने सरकार की बयानबाजी पर भी सवाल उठाए. सिंह ने कहा कि कभी सुबह, कभी दोपहर और कभी शाम को अलग-अलग बयान आते हैं, जबकि अमेरिका की ओर से यह संकेत दिए जा रहे हैं कि कृषि उत्पादों पर शून्य शुल्क पर भारत में प्रवेश हो सकता है. ऐसे में यह कहना कि खेती प्रभावित नहीं होगी, किसानों के साथ मजाक है.
सांसद ने गैर-शुल्क बाधाएं (NTBs- Non Tariff Barriers) हटाने पर भी चिंता जताई और पूछा कि क्या इससे बीज कानून, पौध संरक्षण नियम और खेती से जुड़े अन्य कानूनों में बदलाव किया जाएगा. उन्होंने बीज कानून, कीटनाशक कानून और बिजली संसोधन कानून को संसद की स्थायी समिति को भेजने की मांग दोहराई और आरोप लगाया कि सरकार चर्चा से बच रही है.
बिहार का उदाहरण देते हुए सिंह ने कहा कि 2006 में APMC प्रणाली खत्म होने के बावजूद वहां न किसानों की आमदनी बढ़ी और न ही पलायन रुका. इससे साफ है कि MSP और मंडी व्यवस्था किसानों के लिए सुरक्षा कवच हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ये ढांचे पूरे देश से हटाए गए तो हालात और बिगड़ेंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय किसानों को मिलने वाली सब्सिडी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जबकि हकीकत में उन्हें सीमित सहायता ही मिलती है. संसद की स्थायी समिति द्वारा MSP की कानूनी गारंटी की सिफारिश किए जाने के बावजूद सरकार का उस पर चुप रहना गंभीर सवाल खड़े करता है.
वहीं, दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि किसी भी ट्रेड डील में किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा. (पीटीआई)