महाराष्ट्र का बीड जिला अक्सर सूखाग्रस्त माना जाता है, लेकिन आष्टी तालुका की एक महिला किसान ने यहां कमाल कर दिखाया है. कानडी खुर्द मेहकरी गांव की मंदाकिनी नानासाहेब गव्हाणे ने यह साबित कर दिया कि सही सोच और मेहनत से सूखी जमीन भी सोना उगल सकती है.
मंदाकिनी ताई ने पारंपरिक खेती को छोड़कर जैविक कद्दू (डांगर भोपला) की खेती शुरू की. उन्होंने रासायनिक खाद और दवाओं का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया और पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती पर भरोसा किया.
आज जहां खेती को घाटे का सौदा कहा जाता है, वहीं मंदाकिनी ताई ने प्रति एकड़ सिर्फ 7 हजार रुपये खर्च कर खेती का नया मॉडल पेश किया. कम लागत में अच्छी पैदावार ने सभी किसानों को चौंका दिया.
मंदाकिनी ताई की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने 8 महीनों में 3 बार फसल ली. हर बार करीब 15 टन उत्पादन हुआ और कुल मिलाकर 45 टन कद्दू की बंपर पैदावार मिली.
उन्होंने खाद के लिए बाजार पर निर्भर रहने के बजाय खेत के कचरे और सूखे पत्तों से खुद जैविक खाद तैयार की. कीटनाशक छिड़काव के लिए भी केवल प्राकृतिक और जैविक तरीकों का ही इस्तेमाल किया.
जैविक तरीके से उगाए गए कद्दू की गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि इसकी मांग अब सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत 5 राज्यों में पहुंच चुकी है. लोग इसे स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित मानते हैं.
कम बारिश वाले आष्टी क्षेत्र की यह महिला किसान आज जिले के दूसरे किसानों के लिए दीपस्तंभ बन चुकी हैं. मंदाकिनी ताई ने दिखा दिया कि कम पानी और कम लागत में जैविक खेती से भी लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं.