
इजरायल अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध को तकरीबन एक महीने से ज्यादा का वक्त गुजर गया है. इस युद्ध का असर भारत पर भी लगातार दिखाई दे रहा है और युद्ध के शुरुआती दिनों के बाद से ही एलपीजी का जो संकट पैदा हुआ था. वह अभी भी बरकरार है. अक्सर जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि अभी भी वहां पर LPG की किल्लत है और गैस का सिलेंडर पाने के लिए लोग मारामारी कर रहे हैं.
लेकिन उत्तर प्रदेश का एक ऐसा गांव है, जहां के लोगों को इस समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है. वजह यह है कि गांव में लगा बायोगैस प्लांट उनके लिए इस संकट काल में संजीवनी का काम कर रहा है. यहां के लोगों के सामने ना तो LPG सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी लाइन लगाने का झंझट है और ना ही गैस सिलेंडर बुक करने की समस्या.
जी हां, तकरीबन डेढ़ सौ परिवारों वाले इस गांव के 125 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल कर रहे हैं और अपने आप को काफी खुशनसीब समझ रहे हैं. कम से कम एलपीजी संकट के इस दौर में उन्हें लंबी-लंबी लाइन नहीं लगानी पड़ रही है. यह तस्वीर पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के नियमताबाद ब्लॉक के एकौनी गांव की है.
एक तरफ जहां मिडिल ईस्ट वार की वजह से लोग LPG का संकट झेल रहे हैं. वहीं, इस गांव के लोग बायोगैस प्लांट से उत्पादित गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं. बायोगैस प्लांट से इन सभी ग्रामीणों को सुबह 3 घंटे और शाम को 3 घंटे की बायोगैस की सप्लाई मिलती है. जिसका इस्तेमाल यह लोग खाना पकाने में करते हैं. दरअसल, आज से 4 साल पहले गांव के रहने वाले चंद्र प्रकाश सिंह नाम के एक युवक ने गांव की तस्वीर बदल दी.
2022 में जब चंद्र प्रकाश ने अपने गांव में बायोगैस प्लांट का निर्माण किया था और गांव के तकरीबन सवा सौ लोगों को गैस का कनेक्शन दिया था. तब ना तो चंद्र प्रकाश ने और न ही गांव के लोगों ने इस बात की कल्पना की थी कि आने वाले दिनों में कभी LPG का संकट देश में गहरा जाएगा और लोग LPG के लिए दर-दर भटक रहे होंगे.
लेकिन जब मिडिल ईस्ट वार की वजह से देश में घरेलू गैस सिलेंडर का संकट पैदा हुआ और लोग गैस सिलेंडर के लिए घंटो-घंटो लाइन में खड़े दिखाई देने लगे. तो ऐसी क्राइसिस में एकौनी गांव के लोगों को महसूस हुआ कि आज से 4 साल पहले जो इन्होंने बायोगैस प्लांट से बायोगैस का कनेक्शन लेने का फैसला किया था वह एक सही फैसला था.
दरअसल, एकौनी गांव के रहने वाले युवा चंद्र प्रकाश सिंह ने इंदौर से बीटेक की पढ़ाई कंप्लीट की. लेकिन नौकरी करने का उनका इरादा बदल गया. चंद्र प्रकाश के पिता ने गांव में ही एक गौशाला खोल रखी थी, जिसमें आज से 10 साल पहले 50 के आसपास गाय थीं. चंद्र प्रकाश जब बीटेक की पढ़ाई कर वापस लौटे तो उन्होंने नौकरी के लिए प्रयास नहीं किया बल्कि अपने पिता का हाथ बटाने के लिए गौशाला के काम में शामिल हो गए.
चंद्रप्रकाश बताते हैं कि बायोगैस की कीमत सामान्य एलपीजी की कीमत से तकरीबन आधी है, और इस प्रयोग से उनकी गौशाला से प्रतिदिन निकलने वाले तकरीबन 3000 किलो गोबर का सही उपयोग हो जाता है. चंद्र प्रकाश आगे बताते हैं कि वर्तमान समय में जिस तरह लोग एलपीजी संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में कम से कम उनके गांव के लोग इस मामले में काफी सुखी महसूस कर रहे हैं.