1967-68 के बजट में ग्रीन रिवोल्यूशन की नींव रखी गई. तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के इस बजट ने भारतीय कृषि को नई दिशा दी. इसमें सिंचाई परियोजनाओं, उच्च उपज वाले बीज (HYV) और उर्वरकों के उपयोग को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया गया.
असर: 1960 के दशक में जहां खाद्यान्न उत्पादन करीब 50 मिलियन टन था, वहीं अगले कुछ वर्षों में यह तेजी से बढ़कर लगभग 90-95 मिलियन टन के स्तर तक पहुंच गया. भारत खाद्य आयात पर निर्भर देश से आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ा. यह बजट ग्रीन रिवोल्यूशन का मजबूत आधार साबित हुआ.
तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों में कृषि को भी शामिल किया. निर्यात प्रतिबंधों में ढील, इनपुट ड्यूटी में कमी और बाजार आधारित नीतियों की शुरुआत हुई.
असर: लंबे समय में कृषि विकास दर में सुधार देखा गया और यह औसतन 4 प्रतिशत के आसपास पहुंची. फल-सब्जी, बागवानी और कृषि निर्यात को नए बाजार मिले. यह बजट भारतीय कृषि को वैश्विक बाजार से जोड़ने वाला अहम मोड़ था.
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए करीब 60,000 करोड़ रुपये की कर्ज माफी योजना घोषित की. कृषि लोन लक्ष्य को भी बढ़ाया गया.
असर: करीब 4 करोड़ किसानों को सीधी राहत मिली. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग पहुंच बढ़ी और किसानों पर वित्तीय दबाव कम हुआ. वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान भी कृषि क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा.
तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना की शुरुआत की. इसके तहत छोटे किसानों को सालाना 6,000 रुपये की डायरेक्ट आय सहायता की शुरुआत हुई.
असर: अब तक 11 करोड़ से ज्यादा किसानों को इस योजना के तहत 3.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि ट्रांसफर हो चुकी है. यह भारत में डायरेक्ट इनकम सपोर्ट का नया मॉडल बना. सालाना 6000 रुपये की इस राशि से किसानों को खाद-बीज जैसी जरूरताें को पूरा करने में मदद मिलती है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 लाख करोड़ रुपये का एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर फंड घोषित किया. इस बजट में भंडारण, लॉजिस्टिक्स, e-NAM और कृषि तकनीक पर जोर दिया गया.
असर: 2020 से 2023 के बीच कृषि निर्यात 50 बिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर गया. महामारी के कठिन दौर में भी कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बना रहा.
इस बजट में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जिसमें फसल विविधीकरण, जल संरक्षण और टिकाऊ खेती को प्राथमिकता दी गई.
असर: देश का खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा. MSP में निरंतर बढ़ोतरी से किसानों की आय को सहारा मिला. सस्टेनेबिलिटी पर फोकस ने खेती को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के इस बजट में कृषि आवंटन को और बढ़ाया गया. कम उत्पादक जिलों के लिए विशेष योजना, KCC सीमा 5 लाख रुपये और डिजिटल कृषि पर अतिरिक्त निवेश की घोषणा हुई.
असर: AI, रिमोट सेंसिंग और डेटा आधारित खेती को बढ़ावा देने की दिशा तय हुई. कृषि उत्पादकता बढ़ाने और निर्यात को नए स्तर तक ले जाने का रोडमैप तैयार किया गया. यह बजट कृषि के डिजिटल परिवर्तन की मजबूत शुरुआत माना जा रहा है
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