
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले में 31 साल पुराने भूमि अधिग्रहण मामले में प्रशासन की लापरवाही पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है. किसान को तय मुआवजा नहीं मिलने पर कोर्ट ने जिलाधिकारी की चल संपत्ति जब्त करने का वारंट जारी कर दिया है. जब अदालत का बेलिफ आदेश का पालन कराने कलेक्टर कार्यालय पहुंचा, तो करीब तीन घंटे तक जिलाधिकारी का मुख्य चेंबर बंद रहा. इसके बाद बेलिफ ने चेंबर बंद होने का पंचनामा तैयार कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी.
यह मामला फुलंब्री तालुका के लिहा गांव के किसान बजरंग ताटू के परिवार से जुड़ा है. वर्ष 1995-96 में सरकार ने एक परियोजना के लिए उनकी करीब 16 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. परिवार को उम्मीद थी कि जल्द ही उन्हें उचित मुआवजा मिल जाएगा, लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं हो सका.
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2022 में अदालत ने किसान परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए करीब 2 करोड़ 22 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था. हालांकि, अदालत के आदेश के बावजूद प्रशासन ने आज तक परिवार को एक रुपये का भी भुगतान नहीं किया. वहीं, अब ब्याज समेत यह राशि बढ़कर करीब 2 करोड़ 48 लाख रुपये बताई जा रही है.
बार-बार आदेश के बावजूद मुआवजा नहीं मिलने पर अदालत ने सख्त कदम उठाते हुए जिलाधिकारी की चल संपत्ति जब्त करने का वारंट जारी किया है. आदेश का पालन कराने पहुंचे कोर्ट के बेलिफ को कलेक्टर कार्यालय में मुख्य चेंबर बंद मिला. लगभग तीन घंटे इंतजार करने के बाद उन्होंने चेंबर बंद होने का पंचनामा तैयार किया, जिससे आगे की कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया.
पीड़ित परिवार का कहना है कि 31 वर्षों के दौरान परिवार के कई सदस्य इस दुनिया से चले गए, लेकिन उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला. परिवार का आरोप है कि जमीन भी चली गई और मुआवजा भी नहीं मिला, जिससे उनकी आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई. परिवार के वकील एडवोकेट बारहाते ने बताया कि यह मुकदमा तीन दशकों से चल रहा है. इस दौरान मूल पक्षकार और मामले की शुरुआत करने वाले वकील दोनों का निधन हो चुका है. अब अगली पीढ़ी अपने अधिकार के लिए अदालत के चक्कर लगा रही है. उन्होंने बताया कि परिवार की एक महिला सदस्य कैंसर से पीड़ित थीं और इलाज के लिए मुआवजे का इंतजार करती रही थीं, लेकिन समय पर पैसा न मिलने के कारण उनका भी निधन हो गया.
एडवोकेट बारहाते ने कहा कि प्रशासन ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया, इसलिए मजबूरी में जब्ती की कार्रवाई करनी पड़ी. अब प्रशासन के खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की याचिका दायर करने की भी तैयारी की जा रही है. वहीं, परिवार के सदस्यों का कहना है कि 80 वर्ष की उम्र में भी उन्हें अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और वे आज भी न्याय मिलने का इंतजार कर रहे हैं. (इसरारुद्दीन चिश्ती की रिपोर्ट)