
महाराष्ट्र के प्रमुख कृषि संस्थानों में शामिल अकोला के डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं का मामला पुलिस तक पहुंच गया है. विश्वविद्यालय की शिकायत और करीब एक महीने की प्राथमिक जांच के बाद एमआईडीसी पुलिस ने कई अधिकारियों, कर्मचारियों और एक कॉन्ट्रैक्टर समेत 7 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है. मामले में फर्जी दस्तावेजों, डुप्लीकेट भुगतान और सरकारी रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी के आरोप लगाए गए हैं.
कृषि विश्वविद्यालय की ओर से 1 अगस्त को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी. शिकायत मिलने के बाद एमआईडीसी पुलिस ने करीब एक महीने तक भुगतान, वाउचर और अन्य दस्तावेजों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की. पुलिस की प्राथमिक जांच पूरी होने के बाद 2 सितंबर की सुबह आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.
पुलिस जांच में कथित तौर पर डुप्लीकेट भुगतान और रिकॉर्ड में गड़बड़ी के मामले सामने आए हैं. आरोप है कि एक ही वाउचर नंबर के जरिए नौ भुगतान दोबारा किए गए. जांच में कुछ ऐसे भुगतानों पर भी सवाल उठे हैं, जिनसे जुड़े काम का रिकॉर्ड संबंधित रजिस्टरों में नहीं मिला.
पुलिस की प्राथमिक जांच के दौरान 23 में से 18 भुगतानों की एंट्री वर्क रजिस्टर या स्टॉक रजिस्टर में नहीं मिलने की बात सामने आई है. इससे सवाल खड़ा हो गया है कि जिन कामों का रिकॉर्ड संबंधित दस्तावेजों में दर्ज नहीं था, उनके लिए भुगतान किस आधार पर किया गया. अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन भुगतानों को किस स्तर पर मंजूरी दी गई थी.
मामले की जांच के दौरान डुप्लीकेट भुगतान से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण फाइलें और संबंधित दस्तावेज गायब पाए जाने की बात भी सामने आई है. इसके अलावा ऑडिट में कृषि महाविद्यालय से संबंधित 74 फाइलों के गायब होने का मामला भी सामने आया है. पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये फाइलें कहां गईं और इनके गायब होने के पीछे किसकी भूमिका थी.
प्राथमिक जांच के बाद पुलिस ने तत्कालीन सहयोगी अधिष्ठाता डॉ. श्यामसुंदर माने, तत्कालीन कुलसचिव हंसराज राठोड, मदन लांजेवार, पंकज पाल, सौरभ मोरे, विलास गुल्हाने और कॉन्ट्रैक्टर म्हातारमारे के खिलाफ मामला दर्ज किया है. आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कथित धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेराफेरी का मामला दर्ज किया गया है.
मामला दर्ज होने के बाद पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई है. पुलिस पूरे मामले की कड़ियां जोड़ने के साथ यह भी जांच कर रही है कि कथित अनियमितताओं का तरीका क्या था और भुगतान की मंजूरी किस स्तर पर दी गई. फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों को तैयार करने और रिकॉर्ड से फाइलें गायब होने के मामले की भी अलग-अलग एंगल से जांच की जा रही है.
इस मामले में शुरुआत में जिम्मेदारी सिर्फ कॉन्ट्रैक्टर तक सीमित करने की कोशिश हुई थी या नहीं, इस पहलू की भी जांच की जा रही है. हालांकि पुलिस की प्राथमिक जांच में विश्वविद्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित भूमिका सामने आने के बाद जांच का दायरा बढ़ गया है.
पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित फर्जी भुगतान का पूरा सिस्टम कैसे काम करता था और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे. जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि फाइलें किसने गायब कीं, रिकॉर्ड में हेराफेरी किस स्तर पर हुई और इस पूरे कथित घोटाले का मुख्य सूत्रधार कौन था. पुलिस की आगे की जांच में इस मामले से जुड़े कई और तथ्य सामने आने की उम्मीद है.