
देश में इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन इसका फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है. केंद्र सरकार ने मार्केटिंग सीजन 2026-27 के लिए मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2410 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, फिर भी अधिकांश राज्यों में किसानों को इससे कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ रही है.
सितंबर 2026 के थोक बाजार आंकड़ों पर नजर डालें तो औसत मक्का कीमत 2247.86 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज हुई, जो MSP से करीब 162 रुपये कम है. यह स्थिति तब है जब सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ा रही है और मक्का इथेनॉल उद्योग का प्रमुख कच्चा माल बनता जा रहा है.
राज्यों के आंकड़े भी किसानों की परेशानी को साफ दिखाते हैं. उत्तर प्रदेश में मक्का का औसत भाव 2135 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो MSP से 275 रुपये कम है. हरियाणा में किसानों को 2139 रुपये, राजस्थान में 2159 रुपये और मध्य प्रदेश में केवल 1994 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला. मध्य प्रदेश में तो कीमत MSP से 400 रुपये से अधिक नीचे रही.
कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में हालात और भी चिंताजनक हैं. छत्तीसगढ़ में कीमत 2007 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज हुई, जबकि उत्तराखंड में यह सिर्फ 1471 रुपये प्रति क्विंटल रही. इन राज्यों के किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है.
हालांकि कुछ राज्यों में MSP से अधिक कीमतें दर्ज की गईं. पश्चिम बंगाल में 2550 रुपये, कर्नाटक में 2505 रुपये, महाराष्ट्र में 2462 रुपये और आंध्र प्रदेश में 2457 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला. लेकिन ऐसे राज्यों की संख्या सीमित है और राष्ट्रीय औसत अब भी MSP से नीचे बना हुआ है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल प्लांटों की बढ़ती संख्या के कारण मक्के की मांग में इजाफा हुआ है. केंद्र सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए मक्का की खपत तेजी से बढ़ी है. इसके बावजूद किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि खरीद व्यवस्था मजबूत नहीं है और MSP पर सरकारी खरीद लगभग नगण्य रहती है.
पिछले एक साल का ट्रेंड भी यही बताता है कि किसानों को लगातार MSP से नीचे भाव मिलते रहे हैं. मांग बढ़ने के बावजूद बाजार का ट्रेंड ऐसा है कि लाभ का बड़ा हिस्सा व्यापार और प्रोसेसिंग यूनिटों तक सिमट कर रह जाता है, जबकि किसान को उचित मूल्य नहीं मिल पाता.
किसान संगठनों का कहना है कि यदि सरकार मक्का उत्पादन बढ़ाना चाहती है और इथेनॉल सेक्टर के लिए इसे रणनीतिक फसल मानती है, तो MSP पर प्रभावी खरीद की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी. अन्यथा बढ़ती मांग और बढ़ते उपयोग के बावजूद किसानों की आय में बहुत बड़ा सुधार नहीं हो पाएगा.
मक्का किसानों के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इथेनॉल उद्योग में उनकी फसल की मांग बढ़ रही है, तब भी उन्हें सरकार की ओर से निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य क्यों नहीं मिल रहा. यह सवाल आने वाले दिनों में कृषि और इथेनॉल नीति दोनों के केंद्र में रह सकता है.