
कर्नाटक में प्याज किसानों के सामने बड़ी मुसीबत है. अभी मॉनसून आना बाकी है, लेकिन उससे पहले ही प्याज की गांठों में नमी बढ़ जाने से फंगल बीमारी का प्रकोप देखा जा रहा है. बेंगलुरु मार्केट में आने वाले प्याज में यह समस्या गंभीर है. इस वजह से प्याज की कीमतें गिरी हैं. मार्केट में अच्छे प्याज का भाव जहां 25-30 रुपये है, वहीं फंगल बीमारी से ग्रसित प्याज का रेट 15 रुपये भी नहीं मिल रहा है. प्याज में यह बीमारी काली फंगस या मोल्ड (फफूंदी) की वजह से आई है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आने से पहले ही कई इलाकों में बेमौसम बारिश हुई है.
कर्नाटक में प्याज का सालाना औसत उत्पादन 20 लाख टन से ज्यादा है, लेकिन खेती में बारिश अहम भूमिका निभाती है. बागवानी विभाग के अधिकारियों ने 'दि हिंदू' को बताया, पिछले साल राज्य में 1,52,000 हेक्टेयर जमीन पर प्याज उगाया गया था. हर साल प्याज उगाने वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि उन्हें दूसरी फसलों के उलट तीन से चार महीने में ही कमाई हो जाती है.
बागवानी (सब्जी) विभाग के संयुक्त निदेशक के. धनराज ने बताया, "प्याज पर लगने वाला काला मोल्ड फसल कटने के बाद होने वाली बीमारी है. यह बारिश के मौसम में ज्यादा होती है, जब हवा में नमी ज्यादा होती है, खासकर बेंगलुरु में. इसे आम तौर पर 'एस्परगिलस नाइजर' (Aspergillus niger) के नाम से जाना जाता है. फसल कटने के बाद होने वाली यह बीमारी प्याज की खरीफ फसल में देखी जाती है. रबी के मौसम में, जब मौसम सही होता है, तो फसल को 'क्यूरिंग' (सुखाने) की प्रक्रिया से गुजारा जाता है. इससे बाहरी छिलका सूख जाता है और लंबे समय तक स्टोर करने पर फंगस नहीं लगती."
उन्होंने आगे कहा, "सूखे मौसम में फसल कटने के बाद होने वाली ऐसी बीमारियां नहीं होतीं. किसान सूखे मौसम और धूप का फायदा उठाते हुए प्याज को फैलाकर सुखाते हैं. हालांकि, बारिश से प्रभावित इलाकों में प्याज पर फंगस लग जाती है और वे अंदर से सड़ने भी लगते हैं. अभी, चल्लाकेरे और होसादुर्गा जैसी जगहों पर, राज्य में कुछ दिन बारिश होने और मिट्टी के नरम होने के बाद किसानों ने प्याज की खेती के लिए बीज बोना शुरू कर दिया है. विजयपुरा, बागलकोट, गडग और कोप्पल जैसे जिले प्याज की खेती के लिए जाने जाते हैं."
धनराज ने सलाह दी कि किसानों को हवादार स्टोरेज सुविधाएं रखनी चाहिए जहां कमरे का तापमान कम से कम 10°C हो. उन्होंने कहा, "चूंकि यह खरीफ और रबी दोनों मौसमों की फसल है, इसलिए कर्नाटक में खरीफ फसल की बुवाई जून में होती है और इसकी कटाई सितंबर के आखिर तक हो जाती है. रबी प्याज की बुवाई अक्टूबर में होती है और इसकी कटाई जनवरी के आखिर या फरवरी की शुरुआत में होती है. कटाई के बाद 'क्यूरिंग' (सुखाने) की प्रक्रिया में आमतौर पर 14 से 20 दिन लगते हैं. अगर प्याज की कटाई के एक-दो दिन के भीतर ही उसे बिना ठीक से सुखाए पैक कर दिया जाए, तो उसमें फंगस लग जाती है, लेकिन यह धीरे-धीरे पनपती है."
वहीं, बागवानी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर शालिनी एम. ने कहा, "कर्नाटक के बारिश से प्रभावित इलाकों में 2025 की शुरुआत से ही ऐसे प्याज बाजार में ज्यादा दिखने लगे हैं, क्योंकि वहां हवा में नमी ज्यादा रहती है. प्याज की किस्म के आधार पर बुवाई के 90 से 110 दिनों बाद फसल तैयार हो जाती है. हालांकि, कटाई के बाद प्याज को 'क्यूरिंग' प्रक्रिया से गुजारना जरूरी होता है, यानी उन्हें अच्छी तरह सूखने के लिए या तो खेतों में या किसी बड़े कमरे में छोड़ना पड़ता है. कई बार, जब किसानों को अच्छी कीमत मिलती है, तो वे प्याज की कटाई करते हैं और बिना सुखाए ही व्यापारियों को बेच देते हैं. ऐसे मामलों में, जब उन्हें गोदामों में रखा जाता है, तो उनमें काली फफूंद (ब्लैक मोल्ड) लग जाती है."
व्यापारियों ने इस बात पर भी जोर दिया कि बाजार में खराब क्वालिटी वाले प्याज का असर प्याज की कीमतों पर कैसे पड़ता है. बैंगलोर अनियन एंड पोटैटो मर्चेंट्स एसोसिएशन के सचिव बी. रविशंकर ने कहा, "जब बाजार में ऐसे प्याज दिखते हैं, तो ग्राहक मोल-भाव करते हैं. इससे व्यापारियों और किसानों दोनों को नुकसान होता है. प्याज की कीमत 5 रुपये से शुरू होती है और अच्छी क्वालिटी वाले प्याज 25-30 के बीच बिकते हैं."
उन्होंने मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में किसानों के बनाए बेहतर स्टोरेज सिस्टम के बारे में भी बताया. उन्होंने कहा, "वे लोहे की जाली वाले ढांचे बनाते हैं और नमी से बचाने के लिए उनके अंदर छोटे पंखे लगाते हैं. ऐसे स्टोरेज यूनिट बनाने के लिए उन्हें राज्य सरकार से सब्सिडी भी मिलती है. कर्नाटक में भी सरकार ऐसी पहल के लिए सब्सिडी देती है, लेकिन कम किसान इसका फायदा उठाते हैं. महाराष्ट्र में कोई भी किसान बाजार में बेचने के लिए प्याज के 20 से 50 बोरे स्टॉक करके रखता है, ताकि जब कर्नाटक में बारिश की वजह से फसल खराब हो और कीमतें अपने आप बढ़ जाएं - कभी-कभी 150 रुपये प्रति किलो तक - तो वे उन्हें बेच सकें."
नवलगुंड के प्याज किसान वीरन गौड़ा पाटिल ने कहा, "बारिश की आशंका के कारण, किसान प्याज के पूरी तरह तैयार होने से पहले ही उनकी कटाई करके उन्हें बेच देते हैं. इसी वजह से प्याज में फंगस लग जाती है. कर्नाटक के उत्तरी हिस्सों में हमने प्याज में कटाई के बाद ऐसी बीमारियां नहीं देखी हैं, सिवाय इसके कि पानी के संपर्क में आने पर वे अंदर से सड़ जाते हैं. ऐसे मामलों में, हमें बाजार में प्याज की असल कीमत का आधा भी नहीं मिल पाता है."