Organic Carbon: मिट्टी में बढ़ेगा ऑर्गेनिक कार्बन और मिलेगी आधुनिक तकनीक, तभी बदलेगी किसान की किस्मत

Organic Carbon: मिट्टी में बढ़ेगा ऑर्गेनिक कार्बन और मिलेगी आधुनिक तकनीक, तभी बदलेगी किसान की किस्मत

कानपुर के CSA विश्वविद्यालय में शुरू हुए 'मृदा संकल्प अभियान' का मुख्य संदेश है कि खेती को बचाने के लिए मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाना और आधुनिक तकनीक अपनाना अब अनिवार्य है. विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और घटती जोत के दौर में आत्मनिर्भर बनने के लिए पुरानी गलतियों को सुधारना होगा. मिट्टी की 'सूक्ष्म शक्ति' यानी मित्र जीवाणुओं को बचाने के लिए रसायनों का मोह छोड़कर जैविक खेती और ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों को अपनाना जरूरी है.

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क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • Jan 24, 2026,
  • Updated Jan 24, 2026, 6:26 PM IST

आज के समय में भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती मिट्टी में जीवांश कार्बन की भारी कमी और जमीन की उपजाऊ क्षमता का लगातार गिरना है. अंधाधुंध रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी बेजान होती जा रही है. दूसरी ओर, आबादी बढ़ने के साथ परिवारों में जमीन का बंटवारा हो रहा है, जिससे किसानों के पास खेती की जोत छोटी होती जा रही है. कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति के. विजयेंद्र पांडियन ने भविष्य में आने वाले जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति सभी को आगाह किया. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आज के बदलते मौसम और अनिश्चित बारिश को देखते हुए खेती के पुराने तरीकों को बदलना बहुत जरूरी हो गया है. खेती की बढ़ती लागत को कम करने के लिए उन्होंने किसानों को जैविक खेती, सही फसल चक्र और कीटों से बचाव के लिए आधुनिक कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह दी. कुलपति जी ने इस बात पर सबसे अधिक जोर दिया कि यदि हम मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ाने में सफल होते हैं, तो रासायनिक खादों पर हमारी निर्भरता अपने आप कम हो जाएगी. इससे न केवल किसानों का खाद पर होने वाला खर्च बचेगा, बल्कि मिट्टी की सेहत और उसकी उपजाऊ शक्ति में भी बड़ा सुधार होगा.

ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाएं, आधुनिक तकनीक अपनाएं

विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित 'मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ाओ संकल्प अभियान' का मुख्य उद्देश्य मिट्टी की खोई हुई उर्वरता को फिर से जीवित करना है. कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि आज के समय में मिट्टी को रसायनों से मुक्त करना और किसानों को आधुनिक तकनीकों के प्रति जागरूक करना सबसे बड़ी जरूरत है. इस अवसर पर कृषि क्षेत्र के सामने आ रही नई समस्याओं और उनके वैज्ञानिक समाधानों पर विस्तार से चर्चा की गई. इसी कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2026 का नया कृषि कैलेंडर भी जारी किया गया, जो किसानों को पूरे साल सही समय पर सही तकनीक अपनाने में मदद करेगा. इस पूरे अभियान का लक्ष्य एक ऐसी खेती व्यवस्था बनाना है जो प्राकृतिक रूप से मजबूत हो और किसानों को अधिक मुनाफा दे सके.

ड्रिप इरिगेशन और हाइड्रोपोनिक्स अपनाएं किसान 

झांसी कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार, डॉ. एस. के. सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में वैज्ञानिकों और छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि आज के दौर में खेती में आत्मनिर्भरता बिना तकनीक के संभव नहीं है. उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि भारत का पहला कृषि विज्ञान केंद्र 1974 में पांडिचेरी में स्थापित हुआ था, और तब से लेकर आज तक कृषि विज्ञान ने लंबी दूरी तय की है. उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की कि वे लैब में तैयार होने वाली नई तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुंचाएं. उन्होंने विशेष रूप से ड्रिप इरिगेशन और हाइड्रोपोनिक्स जैसी विधियों को अपनाने पर जोर दिया, जो कम पानी में अधिक पैदावार देने में सक्षम हैं. उन्नत बीज और आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग करके न केवल किसानों की मेहनत कम होगी, बल्कि गांवों में खेती का स्वरूप भी अधिक पेशेवर और लाभदायक बनेगा. तकनीक का सही उपयोग ही भविष्य की कृषि को सुरक्षित और उत्पादनशील बना सकता है.

मिट्टी में जीवांश बढ़ाएं, खेती की लागत घटाएं

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारत के 140 मिलियन हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए मिट्टी के जीवाणुओं का संरक्षण जरूरी है. निदेशक प्रसार डॉ. आर. के. यादव ने जानकारी दी कि एक ग्राम मिट्टी में लगभग 6,000 से अधिक मित्र जीवाणु होते हैं, जो पर्यावरण और फसल उत्पादन के लिए वरदान हैं. इसके साथ ही, किसानों की आय बढ़ाने के लिए स्थानीय मंडियों के उपयोग और फसल कटाई के बाद प्रोसेसिंग पर ध्यान देने को कहा गया. बांदा कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. एन. के. वाजपेई ने किसानों को प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित करने के नए तरीकों पर अपनी जानकारी दी.

"मिट्टी की जान है ऑर्गेनिक कार्बन"

आज के समय में भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती मिट्टी में जीवांश कार्बन की भारी कमी और जमीन की उपजाऊ क्षमता का लगातार गिरना है. अंधाधुंध रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी बेजान होती जा रही है. दूसरी ओर आबादी बढ़ने के साथ परिवारों में जमीन का बंटवारा हो रहा है, जिससे किसानों के पास खेती की जोत छोटी होती जा रही है. अब चुनौती यह है कि कम जमीन पर अधिक पैदावार कैसे ली जाए. इसका एकमात्र सुरक्षित समाधान 'जैविक खेती' है. जैविक तरीके अपनाकर न केवल हम लागत कम कर सकते हैं, बल्कि ऐसी फसलें उगा सकते हैं जो रसायनों से मुक्त हों. जब मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ेगी, तो वह लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहेगी. यह न केवल हमारी मिट्टी को बचाएगा, बल्कि जहरीले रसायनों से मुक्त अनाज पैदा करके इंसानों के स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखेगा. हमें ऐसी सस्टेनेबल खेती की ओर बढ़ना होगा जहां पैदावार भी अधिक हो और प्रकृति का संतुलन भी न बिगड़े.

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