
अब पहाड़ी इलाकों में धान की पराली, किसानों के लिए बंपर कमाई का साधन साबित होने वाली है. आईसीआर के वैज्ञानिकों ने पहाड़ी इलाकों में 'किंग ऑयस्टर मशरूम' उगाने में बड़ी सफलता हासिल की है. यह कोई साधारण मशरूम नहीं है, बल्कि दुनिया भर के बड़े होटलों और विदेशी बाजारों, खासकर चीन और कोरिया में इसकी भारी डिमांड है. अपनी खास बनावट, मोटे तने और लाजवाब स्वाद के कारण इसे 'किंग' कहा जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसे उगाने के लिए धान की पराली का इस्तेमाल किया जाता है. इसका मतलब है कि अब किसान पराली की समस्या को समाधान में बदलकर मोटी कमाई कर सकते हैं. यह मशरूम न केवल स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी ऊंची कीमत किसानों की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल सकती है.
किंग ऑयस्टर मशरूम की खेती के लिए अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों का वातावरण एकदम कुदरती वरदान की तरह है. वैज्ञानिक तौर पर इसे बढ़ने के लिए 20 से 23 डिग्री और फल लगने के समय 15 से 18 डिग्री तापमान की जरूरत होती है, जो यहां आसानी से मिल जाता है. धान के पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर और उसे उपचारित करके यह मशरूम उगाया जाता है. वैज्ञानिकों ने देखा कि पहाड़ों की नमी और साफ हवा के कारण इसके गुच्छे बहुत ही शानदार और सेहतमंद निकल रहे हैं. यह सफलता साबित करती है कि अगर सही तकनीक अपनाई जाए, तो हमारे पहाड़ी किसान दुनिया के बेहतरीन मशरूम पैदा बंपर कमाई कर सकते हैं.
किंग मशरूम की खेती की सबसे खास बात यह है कि उपज पाने के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ता. किंग ऑयस्टर मशरूम का पूरा जीवन चक्र महज 30 से 35 दिनों में पूरा हो जाता है. इसका मतलब है कि साल में इसकी कई फसलें ले सकते हैं. इसकी उत्पादन क्षमता (Biological Efficiency) भी बहुत ज्यादा है, यानि एक जो लगभग 80-85% तक पाई गई है. यानी एक किलो पराली से कम से कम 800 से 850 ग्राम मशरूम मिलेगा. अगर आप सही तरीके से प्रबंधन करते हैं, तो बहुत कम लागत और कम समय में आपको भरपूर पैदावार मिलती है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल उन छोटे किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है जिनके पास जमीन कम है लेकिन वे अपनी आय बढ़ाना चाहते हैं.
यह तकनीक न केवल कमाई बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण की रक्षा भी करती है. मशरूम उगाने के बाद जो पुआल बच जाता है, वह बेकार नहीं जाता. उस बचे हुए अवशेष को सड़ाकर बहुत ही उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाई जा सकती है. इस खाद का इस्तेमाल किसान अपने खेतों में दूसरी फसलें उगाने के लिए कर सकते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदने का खर्चा बच जाता है. इस तरह यह एक 'जीरो वेस्ट' मॉडल है, जहां पराली का एक तिनका भी बर्बाद नहीं होता. यह टिकाऊ खेती की दिशा में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक कदम है.
अगर कोई किसान इस नए और मुनाफे वाले बिजनेस को शुरू करना चाहता है, तो अरूणाचल प्रदेश के लेपाराडा जिले के बसर में स्थित मशरूम रिसर्च सेंटर (AICRP) इच्छुक किसानों को पूरी मदद दे रहा है. यहां वैज्ञानिकों द्वारा न केवल ट्रेनिंग दी जा रही है, बल्कि अच्छी क्वालिटी के बीज (स्पॉन) भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. तकनीकी सहायता और बीज मिलने से किसानों के लिए जोखिम कम हो जाता है. अगर अरुणाचल के किसान इसे बड़े पैमाने पर अपनाते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब यह राज्य भारत में प्रीमियम मशरूम उत्पादन का मुख्य केंद्र बन जाएगा. यह नया उद्यम युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक बेहतरीन अवसर है.
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