
कपास को भारत का सफेद सोना कहा जाता था...था मतलब अब नहीं कहा जाता क्योंकि कपास की खेती और किसान कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं. कभी मौसम की मार, कभी कीटों का हमला, तो कभी गिरती पैदावार और दामों का संकट, लेकिन अब केंद्र सरकार ने कपास किसानों के लिए एक बड़ा मिशन लॉन्च कर दिया है. सरकार ने अगले 5 साल के लिए “मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी” को मंजूरी दी है. इस मिशन पर करीब 5659 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इसका मकसद है- कपास की पैदावार बढ़ाना, किसानों की आमदनी सुधारना और भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को मजबूत बनाना. सरकार का कहना है कि यह मिशन “5F विजन” पर काम करेगा. यानी Farm से Fibre, Fibre से Factory, Factory से Fashion और फिर Foreign तक… मतलब खेत से लेकर विदेशी बाजार तक भारतीय कपास को मजबूत पहचान दिलाने की कोशिश, तो अब जानिए कपास मिशन से जुड़े कुछ जरूरी सवालों के जवाब और भारत में कपास की खेती और किसानों के हालात-
इस मिशन में सबसे ज्यादा फोकस बेहतर बीजों पर होगा। ऐसे बीज तैयार किए जाएंगे जो ज्यादा पैदावार दें, मौसम की मार झेल सकें और कीटों से कम प्रभावित हों, क्योंकि अभी गुलाबी सुंडी यानी Pink Bollworm और Whitefly जैसे कीट कपास किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बने हुए हैं.
अब सवाल ये भी उठा कि क्या सिर्फ बीज से हो जाएगा? तो जवाब मिला-नहीं. बीज के अलावा सरकार हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम यानी कम दूरी पर ज्यादा पौधे लगाने की तकनीक को भी बढ़ावा देगी. साथ ही Extra Long Staple Cotton यानी बेहतर क्वालिटी वाले कपास पर भी जोर रहेगा, जिसकी टेक्सटाइल इंडस्ट्री में ज्यादा मांग रहती है.
कपास उत्पादकता मिशन के अलावा भारत सरकार की ही एक पहल है कस्तूरी कॉटन भारत, अबये जान लीजिए कि ये क्या है. दरअसल सरकार भारतीय कपास की ब्रांडिंग करना चाहती है ताकि दुनिया में भारतीय कपास की अलग पहचान बने. इसके तहत कपास की ट्रेसिंग, सर्टिफिकेशन और ब्रांडिंग की जाएगी. मतलब कौन सा कपास कहां उगा, उसकी क्वालिटी कैसी है- सब रिकॉर्ड रहेगा.
फिर सवाल ये भी कि क्या कपास के लिए मंडी व्यवस्था पर भी कुछ काम होगा? फिलहाल इसके जवाब में जो बात सामने आ रही है वो ये है कि सरकार मंडियों को भी डिजिटल बनाने की बात कर रही है. दावा है कि इससे किसानों को सही दाम मिलेगा और बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी. ई-प्लेटफॉर्म के जरिए किसान सीधे बाजार तक पहुंच सकेंगे.
कपास उत्पादकता मिशन के जरिए टारगेट क्या सेट किया गया है? तो जवाब ये हैकि सरकार का लक्ष्य है कि 2031 तक कपास की पैदावार को 440 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 755 किलो प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाया जाए. साथ ही उत्पादन को करीब 498 लाख गांठ तक ले जा सकें.
सवाल-जवाब के बाद अब ये भी जान लीजिए कि भारत में कपास क्या है. भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां कपास की चारों प्रमुख प्रजातियां उगाई जाती हैं. देश में महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और राजस्थान बड़े कपास उत्पादक राज्य हैं, लेकिन चुनौती ये है कि करीब 65 प्रतिशत कपास की खेती अब भी बारिश पर निर्भर है. यानी मौसम बिगड़ा तो फसल भी बिगड़ सकती है. सरकार MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए भी किसानों को सुरक्षा देती है. जब बाजार में कपास का भाव MSP से नीचे जाता है, तब Cotton Corporation of India यानी CCI किसानों से खरीद करती है.
आपने बीटी कॉटन के बारे में सुना होगा। कॉटन की इतनी बात हो रही है तो अब जान भी लीजिए. बीटी कॉटन भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास की एक किस्म है. इसे बैसिलस थुरिंगिएन्सिस यानी Bt नामक मिट्टी के बैक्टीरिया के जीन का उपयोग करके विकसित किया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य 'अमेरिकी बॉलवर्म' नाम के कीट से फसल को बचाना है, क्योंकि ये जीन पौधे में ऐसा प्रोटीन बनाता है जो कीट के लिए विषैला होता है.
2002 में लॉन्च होने के बाद, बीटी कॉटन ने बॉलवर्म के हमलों को कम किया. लेकिन अब इन कीटों ने बीटी तकनीक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है, जिससे गुलाबी सुंडी का हमला बढ़ गया है और बीटी कपास की पैदावार में भारी गिरावट आई है.
बात बस इतनी नहीं है बहुत डराने वाली है पहली तो ये कि बीटी कपास के बीज महंगे होते हैं और इसके लिए पेस्टिसाइड का इस्तेमाल बढ़ा है. इससे किसानों की उत्पादन लागत बढ़ गई है. कम पैदावार और बढ़ते कर्ज के कारण किसानों की आत्महत्या के मामले भी सामने आए हैं. यही नहीं बीटी कॉटन के बावजूद गुलाबी सुंडी को कंट्रोल करने के लिए किसान कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जिससे उनकी सेहत पर बड़ी चोट लग रही है. यवतमाल की ट्रेजेडी याद करें तो आंखें और खुल जाएंगी. यवतमाल महाराष्ट्र का वो शहर है जिसे कॉटन सिटी के नाम से जाना जाता है. यहां 2017 में 23 किसानों की मौत तक हो गई थी और एक हजार से ज्यादा किसान बीमार हुए थे. आज भी यहां स्थिति ये है कि कई किसान इन कीटनाशकों के चलते अपनी आंखों की रोशनी तक खोते जा रहे हैं.
तो ये हालात हैं और इन हालातों के बाद अब सरकार लाई है कपास उत्पादकता मिशन, देखना होगा कि ये मिशन इन कपास किसानों को कितनी राहत देगा. क्या ये नया मिशन सच में किसानों की आमदनी बढ़ाएगा? क्या कपास की खेती फिर से फायदे का सौदा बनेगी? या फिर ये योजना भी कागजों तक सीमित रह जाएगी? फिलहाल किसानों की नजर सरकार के इन वादों पर टिकी है.