Urea Shortage: कहां गया यूरिया में आत्मनिर्भर भारत का वादा, 2025 की 'डेडलाइन' भी हुई खत्म

Urea Shortage: कहां गया यूरिया में आत्मनिर्भर भारत का वादा, 2025 की 'डेडलाइन' भी हुई खत्म

यूरिया में आत्मनिर्भर बनने का 2025 का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका. गैस और कच्चे माल के आयात पर निर्भरता के चलते भारत में यूरिया संकट बना हुआ है, जबकि आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है.

urea shortage Indiaurea shortage India
रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Mar 18, 2026,
  • Updated Mar 18, 2026, 5:11 PM IST

भारत सरकार ने यूरिया में आत्मनिर्भर बनने का वादा किया था. इसकी डेडलाइन 2025 तय की गई थी. हकीकत यह है क‍ि साल खत्म हो गया लेकिन यूरिया का संकट बरकरार है. बड़ी उम्मीदों के साथ नैनो यूरिया लाई गई मगर उम्मीद के मुताब‍िक उसका फायदा नहीं मिला. आंकड़ा बताता है कि पिछले साल भले ही यूरिया इंपोर्ट में 32 फीसद की गिरावट आई लेकिन खाद पर दूसरे देशों की निर्भरता अब भी कायम है. वित्तीय वर्ष 26 में भारत का यूरिया इंपोर्ट रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने का अनुमान है. पहले 11 महीनों में 98 लाख टन से ज्यादा आयात किया गया है और 17 लाख टन पाइपलाइन में है. ईरान युद्ध के चलते यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है.

अब सवाल यह है क‍ि आत्मन‍िर्भरता के वादे का क्या हुआ? दरअसल, यूरिया में आत्मनिर्भर नहीं बनने के पीछे सबसे बड़ी वजह गैस और केमिकल के लिए आयात पर निर्भरता है. ऐसे में सवाल यह भी उठता है क‍ि क्या भारत दूसरे देशों से गैस और केमिकल मंगाकर यूरिया में आत्मनिर्भर बन सकता है? बहरहाल, साल 2024 में तत्कालीन रसायन मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा था कि 2025 के अंत तक भारत यूरिया का आयात रोक देगा और देश से ही इसकी जरूरत पूरी की जाएगी. उनका स्पष्ट बयान था कि मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए सरकार कई प्रयास कर रही है जिसका बेहतर रिजल्ट जल्द दिखना शुरू हो जाएगा.

यूरिया की क‍ितनी जरूरत 

यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बारे में पूछे जाने पर, मंडाविया ने कहा था कि मोदी सरकार ने यूरिया आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए दो-तरफा रणनीति अपनाई है. सरकार ने चार बंद पड़े यूरिया प्लांट को फिर से चालू किया है और एक और फैक्ट्री को फिर से चालू कर रही है. घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत को हर साल लगभग 360 लाख टन यूरिया की जरूरत होती है. इसमें से लगभग 300 लाख टन का हम उत्पादन करते हैं. 

विशेषज्ञों का कहना है कि यूरिया आयात बंद करने का दावा तो ठीक है, लेकिन उसे धरातल पर उतारने के लिए कच्चे माल की जरूरत होगी. यह जरूरत बड़े पैमाने पर विदेशों से पूरी होती है. इसलिए आयात पर निर्भर रहते हुए आत्मनिर्भर होना बड़ी चुनौती है. लिहाजा खाद के लिए मारामारी कोई उग्र रूप धारण न कर ले, 2025 की इस डेडलाइन को सरकार ने सरकारी खाद कंपनियों के पाले में डालते हुए 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दिया. अब इस तारीख में भी मुश्किल से 13 दिन बचे हैं. लेकिन हालात पहले की तरह किल्लत वाले बने हुए हैं.

खाद की चिंता क्यों?  

यूरिया को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि ईरान-इजराइल युद्ध जल्द रुकने का नाम नहीं ले रहा है. भारत दुनिया में खादों का सबसे बड़ा खरीदार है जिसमें बड़ा हिस्सा यूरिया का होता है. जरूरी नहीं कि यह खाद तैयार माल के रूप में ही भारत आती हो, बल्कि इसे बनाने के लिए गैस और केमिकल जैसे कच्चे माल विदेशों से खरीदे जाते हैं. यह कच्चा माल फारस की खाड़ी के रास्ते भारत पहुंचता है. 

इस खाड़ी का एक अहम हिस्सा है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जो फारस को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. ईरान जब से लड़ाई में फंसा है, तब से होर्मुज के जरिये तेल, गैस और केमिकल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसने खादों के समीकरण को पूरी तरह बिगाड़ दिया है. 

हालांकि लड़ाई मार्च में शुरू हुई है, लेकिन भारत में यूरिया के आयात की जरूरत पहले से ही बनी हुई है. तभी फरवरी महीने तक ही लाखों टन यूरिया और कच्चा माल आयात किया जा चुका है. कई ऑर्डर अभी पाइपलाइन में हैं. सवाल है कि जब सरकार ने यूरिया आयात की डेडलाइन 2025 तय की थी, तब यह लक्ष्य क्यों चूक गया? क्या देश की तैयारियों में कहीं कमी रही, क्या कच्चे माल में देश आत्मनिर्भर नहीं बन पा रहा, या फिर आयात रोकने के लिए हमारे इरादे अटल नहीं हैं?

विदेशी माल पर निर्भरता 

इन सभी सवालों के जवाब कच्चे माल की विदेशी सप्लाई में छिपे हैं. भारत अपने यूरिया का लगभग 25% हिस्सा आयात करता है. 2025–26 में चीन और रूस से होने वाला आयात तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो कुल मिलाकर 35 लाख टन से भी अधिक रहा. यूरिया का लगभग 75% आयात पारंपरिक रूप से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देशों से होता है, जिसमें प्रमुख सप्लायरों में ओमान, सऊदी अरब, रूस और UAE भी शामिल हैं.

भारत आयात के लिए नेचुरल गैस पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसका इस्तेमाल घरेलू यूरिया बनाने में एक मुख्य कच्चे माल के तौर पर किया जाता है. मध्य पूर्व के देशों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत इंडोनेशिया और बेलारूस जैसे विकल्पों की तलाश कर रहा है. इसके अलावा, भारत ने यूरिया की सप्लाई सुचारू रखने के लिए चीन से संपर्क किया है, क्योंकि युद्ध की मौजूदा स्थितियों के कारण देश को नेचुरल गैस की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. 

विदेशी निर्भरता से आत्मनिर्भरता कैसे? 

घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए जरूरी नेचुरल गैस का लगभग 85% हिस्सा आयात किया जाता है. गैस की इस कमी ने घरेलू प्रोडक्शन में बाधा डाली है, जिससे तैयार यूरिया के आयात पर निर्भरता बढ़ गई है. तैयार यूरिया महंगी पड़ती है जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है. विशेषज्ञों की मानें तो, यह बोझ तब तक हल्का नहीं हो सकता जब तक भारत विदेशी निर्भरता से मुक्त होकर आत्मनिर्भरता की श्रेणी में नहीं आता. लेकिन ऐसा कब तक होगा, यह क‍िसी को नहीं पता.

MORE NEWS

Read more!