खरीफ सीजन की कुल मांग से कम क्यों दिख रहा है खाद का मौजूदा स्टॉक? जानिए इस 'कमी' के पीछे का असली गणित

खरीफ सीजन की कुल मांग से कम क्यों दिख रहा है खाद का मौजूदा स्टॉक? जानिए इस 'कमी' के पीछे का असली गणित

Fertilizer Demand: खरीफ सीजन शुरू हो चुका है. किसान खेतों में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इसी बीच एक बार फिर खाद की किल्लत को लेकर चर्चा तेज हो गई है. सवाल उठ रहे हैं कि जब सामान्य दिनों में ही किसानों को खाद के लिए लंबी लाइनें लगानी पड़ती हैं, तो फिर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच क्या इस बार खाद की सप्लाई प्रभावित होगी? कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़े भी पहली नजर में चिंता बढ़ाते हैं.

Fertilizer ShortageFertilizer Shortage
ओम प्रकाश
  • नई दिल्ली,
  • May 22, 2026,
  • Updated May 22, 2026, 1:47 PM IST

खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत होते ही देश के किसान संगठनों, सोशल मीडिया और ग्रामीण हलकों में एक बार फिर खाद की किल्लत को लेकर बहस छिड़ गई है. लोगों के मन में सवाल है कि जब सामान्य दिनों में भी खाद के लिए किसान लाइनों में खड़े होते और पुलिस से पिटते हैं तो फिर अब मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के असामान्य हालात में खाद कैसे मिलेगी? कृषि मंत्रालय की ने इस बारे में एक डेटा शीट जारी की है, जिसको देखने के बाद कई लोगों का मानना है कि देश में जरूरत के मुकाबले यूरिया और डीएपी का स्टॉक बेहद कम है. 

उदाहरण के लिए, पूरे खरीफ सीजन में देश को 194 लाख मीट्रिक टन (LMT) यूरिया की जरूरत है, जबकि सरकारी गोदामों में अभी केवल 66.30 LMT ही उपलब्ध दिख रहा है. इसी तरह 59.17 LMT डीएपी की कुल मांग के मुकाबले सिर्फ 20.99 LMT का स्टॉक नजर आ रहा है. प्रथम दृष्टया यह आंकड़े डराने वाले हैं. इसे देखकर ऐसा लगता है कि देश खाद के बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है. लेकिन क्या वाकई देश में खाद की कमी है, या इसके पीछे कोई और गणित काम कर रहा है? आइए इसका एक बारीक विश्लेषण करते हैं.

उर्वरक के स्टॉक पर कृषि मंत्रालय की ओर से जारी डेटा शीट

आशंका बनाम हकीकत

कृषि विशेषज्ञों और उर्वरक मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस डेटा को लेकर आम लोगों के मन में भ्रम होना स्वाभाविक है, लेकिन सप्लाई चेन (Supply Chain) के नियमों के तहत यह स्थिति पूरी तरह सामान्य और सुरक्षित लगती है. इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

1. किस्तों में 'खुराक'

धान, मक्का या कपास जैसी खरीफ फसलों का चक्र जून से लेकर अक्टूबर तक चलता है. यानी लगभग 120 से 150 दिन. किसान यूरिया की पूरी बोरी बुवाई के पहले दिन नहीं डालते. यूरिया का इस्तेमाल फसल के अलग-अलग चरणों में होता है. पहली बार बुवाई के समय, दूसरी बार 30 से 40 दिन बाद, और तीसरी बार 60 दिन बाद. चूंकि मांग 5 महीनों में बंटी हुई है, इसलिए सरकार भी इसकी आपूर्ति "जस्ट-इन-टाइम" मॉडल पर हर महीने किस्तों में करती है.
यदि सरकार देश में खरीफ सीजन की कुल जरूरत का पूरा 194 LMT यूरिया और 59 LMT डीएपी मई महीने में ही बनाकर गोदामों में भर दे, तो देश के सामने एक नया संकट खड़ा हो जाएगा. मॉनसून के सीजन में हवा में नमी बहुत ज्यादा होती है. अगर करोड़ों टन खाद महीनों तक गोदामों में डंप रहेगी, तो वह सीलन के कारण पत्थर जैसी सख्त हो जाएगी और खराब हो जाएगी. यह हर किसान जानता है.

2. मई महीने में दोगुना स्टॉक

सरकार ने इस बार 'पैनिक बाइंग' को रोकने के लिए एडवांस प्लानिंग की है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस समय (मई के शुरुआती चरण में) देश को चालू खरीफ कार्यों के लिए केवल 8.75 LMT डीएपी की तत्काल आवश्यकता थी. इसके विपरीत, सरकार ने ग्राउंड पर 20.99 LMT डीएपी की उपलब्धता सुनिश्चित कर रखी है. यानी मौजूदा मांग से 2.3 गुना अधिक माल पहले से बाजार में मौजूद है.

3. बिक्री का क्या इशारा?

इस थ्योरी को इस बात से भी बल मिलता है कि 8 मई 2026 तक देश भर में यूरिया की कुल उपलब्धता 66.30 LMT थी, जिसमें से किसानों ने केवल 3.18 LMT ही खरीदा. यानी 63.12 LMT यूरिया बिना बिका हुआ क्लोजिंग स्टॉक के रूप में सुरक्षित पड़ा है. यही हाल डीएपी का भी है, जहां 20.99 LMT में से मात्र 0.73 LMT की ही बिक्री हुई है और 20.26 LMT का बंपर स्टॉक अभी भी वितरण के लिए तैयार है.

आगे की चुनौती

भले ही मौजूदा स्टॉक मई और जून की शुरुआती जरूरतों के लिए पर्याप्त से अधिक है, लेकिन सरकार के लिए असली परीक्षा जून के अंत और जुलाई महीने में होगी, जब मॉनसून पूरे देश को कवर कर लेगा और बुवाई चरम पर होगी. ऐसे में देश की उर्वरक फैक्ट्रियों को बिना किसी तकनीकी रुकावट के लगातार यूरिया और अन्य खादों का उत्पादन जारी रखना होगा. डीएपी और पोटाश (MOP) के लिए भारत कच्चे माल और विदेशी आयात पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों से माल समय पर भारतीय तटों तक पहुंचना बेहद जरूरी है. स्टॉक पर्याप्त होने के बावजूद, अगर स्थानीय स्तर पर बिचौलियों ने जमाखोरी की या खाद को गैर-कृषि कार्यों-जैसे प्लाईवुड या केमिकल इंडस्ट्री में डाइवर्ट किया, तो कृत्रिम किल्लत पैदा हो सकती है.

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