
उत्तर प्रदेश में इस समय मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, जहां जनवरी के शुरुआती दिनों में तापमान में वृद्धि के बाद अब गिरावट आने की संभावना है. मौसम विभाग के अनुसार, अगले दो हफ्तों तक मौसम शुष्क रहेगा और कई इलाकों में न्यूनतम तापमान 4 से 8 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है. ऐसी परिस्थितियों में, जो किसान किसी कारणवश समय पर बुवाई नहीं कर पाए हैं या जिनकी फसलें देरी से कटने वाले खेतों (जैसे गन्ना या देर से तैयार होने वाली सब्जियां) में लगनी हैं, उनके लिए गेहूं की 'अति-विलंब' श्रेणी वाली बुवाई ही एकमात्र विकल्प बचती है.
हालांकि, जनवरी की इस ठंड और कोहरे के बीच बुवाई करना जोखिम भरा होता है क्योंकि कम तापमान बीज के अंकुरण की गति को धीमा कर देता है, जिससे पैदावार घटने की संभावना बनी रहती है.
जनवरी में गेहूं की बुवाई करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त सही प्रजातियों का चयन करना है. 'उपकार' के वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में केवल उन्हीं किस्मों की बुवाई की जानी चाहिए जो विशेष रूप से 'अति-पछेती' (Very Late) परिस्थितियों के लिए विकसित की गई हैं.
वैज्ञानिक परामर्श के अनुसार, किसानों को PBW-833, HD-3271, HI-1621, K-7903 (हलना) और K-9423 (उन्नत हलना) जैसी क्षेत्रीय संस्तुत किस्मों का ही उपयोग करना चाहिए. इन किस्मों में कम समय में पकने और प्रतिकूल तापमान को सहने की क्षमता होती है. यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि इस देरी वाली बुवाई की प्रक्रिया को हर हाल में 15 जनवरी तक पूर्ण कर लिया जाए, ताकि फसल को पकने के लिए पर्याप्त समय मिल सके.
देरी से बुवाई करने पर सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि पौधों को कल्ले (Tillering) निकालने का पर्याप्त समय नहीं मिलता. इस कमी को पूरा करने के लिए विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि जनवरी में बुवाई करते समय बीज की दर सामान्य से 25 प्रतिशत बढ़ा देनी चाहिए. इसका मतलब है कि प्रति हेक्टेयर लगभग 125 किलोग्राम बीज का प्रयोग किया जाना चाहिए.
बीज की बढ़ी हुई मात्रा यह सुनिश्चित करती है कि खेत में पौधों की संख्या पर्याप्त रहे और कम कल्लों के बावजूद उपज संतुलित बनी रहे. इसके अलावा, बुवाई के समय मिट्टी में उचित नमी का होना अनिवार्य है, क्योंकि शुष्क मौसम और गिरते पारे के बीच बीज को अंकुरित होने के लिए नमी की सख्त जरूरत होती है.
पछेती गेहूं की फसल में बुवाई के 20 से 30 दिन बाद, यानी पहली सिंचाई के आसपास, अक्सर जिंक (जस्ता) की कमी देखी जाती है. यदि पौधों की पत्तियों पर इसके लक्षण दिखाई दें, तो किसानों को तुरंत 5 किग्रा जिंक सल्फेट और 16 किग्रा यूरिया को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
यदि यूरिया उपलब्ध न हो, तो बुझे हुए चूने के निथारे हुए पानी का प्रयोग भी किया जा सकता है. इसके अलावा, समय से बोई गई फसल में प्रत्येक 20 से 25 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए, जिससे जमीन का तापमान बना रहे और फसल को पाले या ठंड से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके.