
केंद्र सरकार की तरफ से अगले कुछ दिनों में एक बड़ा ऐलान हो सकता है. एक अहम पुनर्गठन प्रक्रिया के तहत केंद्रीय कृषि मंत्रालय की तरफ से फ्लैगशिप प्रधानमंत्री-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के साथ तीन अलग-अलग चल रही स्कीमों को एक साथ मिलाने का प्रस्ताव दिया गया है. सूत्रों की मानें तो इस पर अगले पांच सालों में 1.75 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा. मंत्रालय का मानना है कि ऐसा करने से राज्य स्तर पर सुधारों को बढ़ावा मिल सकेगा.
अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि फंड का बंटवारा एक खास पैमाने के आधार पर किया जाएगा. इसमें राज्यों की तरफ से किए गए सुधारों और हासिल की गई उपलब्धियों के नए जोड़े गए असेसमेंट को सबसे तवज्जो दी जाएगी . कृषि विकास योजना को कृषि मे विकास और किसानों की इनकम बेहतर करने के लिए शुरू किया गया था. उसके साथ जिन योजनाओं को मर्ज करने की योजना है उनमें किसानों की इनकम बढ़ाने के लिए कृषोन्ति योजना (KY), नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) और नेशनल बी एंड हनी मिशन (NBHM) के नाम प्रमुख हैं.
कृषि विकास, कृषोन्ति योजना और नैचुरल फार्मिंग मिशन को केंद्र की तरफ से वित्तीय समर्थन हासिल है और राज्य सरकारों की तरफ से भी इसे फंड दिया जाता है. वहीं बी एंड हनी मिशन एक सेंट्रल सेक्टर स्कीम है जिसे केंद्र की तरफ से मिले फंड की मदद से लागू किया जाता है. सूत्रों के मुताबिक, मिनिस्ट्री ने मर्जर से जुड़ा एक नोट वित्त मंत्रालय के तहत वित्तीय समिति को भेजा है. इसके बाद इसे केंद्रीय कैबिनेट के सामने पेश किया जाएगा.
इस पूरे प्रस्ताव को अगले पांच सालों में 16वें वित्तीय कमीशन के दौरान जारी चरण में लागू किया जाएगा. यह अप्रैल 2026 से शुरू होकर मार्च 2031 तक चलेगा. इसे ज्यादातर राज्यों के लिए 60:40 के सेंटर-स्टेट रेश्यो में, नॉर्थईस्टर्न और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 के रेश्यो में और यूनियन टेरिटरीज के लिए 100 परसेंट के रेश्यो में फंड किया जाएगा. सूत्रों की मानें तो प्रस्तावित मर्जर नीति आयोग की सिफारिशों के मुताबिक है. आयोग ने पहले 15वें फाइनेंस कमीशन के राज्यों को कृषि सुधारों को बढ़ावा देने के लिए परफॉर्मेंस-बेस्ड वित्तीय मदद देने के आइडिया को फिर से शुरू किया था.
प्रस्ताव के तहत राज्यों को फंड पांच मुख्य पैरामीटर के तहत दिया जाएगा. इसमें सबसे ज्यादा तवज्जो यानी करीब 30 फीसदी फंड राज्य की तरफ से किए गए सुधारों की पहल और हासिल किए गए माइलस्टोन के आधार पर प्रस्तावित है. अभी यह मानक मौजूदा दिशानिर्देशों में नहीं हैं.
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