
जैसे-जैसे यूपी में चीनी मिलें 20 अक्टूबर के आसपास फिर से खुलने की तैयारी कर रही हैं, सैकड़ों किसानों को त्योहारों के मौसम में एक अच्छी खबर का इंतजार है- 1990 के दशक से गन्ने के पेमेंट में हुई देरी पर मिलने वाला ब्याज.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 6 अक्टूबर के आदेश और इलाहाबाद हाई कोर्ट के 31 अगस्त के आदेश के बाद फिर से चर्चा में आया है. इन आदेशों में पाया गया कि बकाया रिकवरी सर्टिफिकेट के तहत चीनी मिलों से 1,936 करोड़ रुपये वसूलने बाकी थे. इसमें से 1,087 करोड़ रुपये गन्ने का मूल बकाया था और 849.5 करोड़ रुपये ब्याज था. हाई कोर्ट ने बताया है कि "बकाया रकम और 849.5 करोड़ रुपये का ब्याज... ब्याज के तौर पर एक पैसा भी वसूल नहीं किया गया है".
हाई कोर्ट ने अधिकारियों को तब भी फटकार लगाई जब पहले तय की गई 15% की दर के बजाय 12% ब्याज दर पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किए गए. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कार्यवाही के खिलाफ यूपी सरकार की चुनौती को खारिज कर दिया. यूपी सरकार ने तर्क दिया था कि आर्थिक तंगी से जूझ रही मिलों पर 15% ब्याज देने का दबाव डालने से वे दिवालिया हो सकती हैं और मिलें बंद होने पर किसानों को नुकसान हो सकता है.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यूपी गन्ना (आपूर्ति और खरीद का विनियमन) अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) ब्याज में कटौती या उसे माफ करने की अनुमति देती है. सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया और 14 दिन की समय-सीमा और 15% ब्याज को "कर्ज के जाल से बचने के लिए जरूरी सुरक्षा उपाय" बताते हुए दोहराया.
इस विवाद की मुख्य वजह मिलों द्वारा किसानों को गन्ने की आपूर्ति के लिए भुगतान करने की कानूनी 14 दिन की समय-सीमा है, जिसके बाद बकाया राशि पर ब्याज देना होता है.
किसान नेता वी.एम. सिंह, जो जनता दल के पूर्व विधायक और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन (RKMS) के प्रमुख हैं और जिन्होंने 2006 में PIL (जनहित याचिका) दायर की थी, के लिए यह ताजा घटनाक्रम उनकी बरसों की लड़ाई की जीत है. सिंह ने TOI से कहा, "यह आदेश एक बड़ी उपलब्धि है. सोचिए, एक किसान के लिए 30 साल के इंतजार का क्या मतलब होता है."
बिजनौर में, जहां किसान धरना दे रहे हैं, विरोध प्रदर्शन के नेता कैलाश लांबा ने कहा कि उनकी तत्काल मांग किसानों का कथित तौर पर बकाया ब्याज का अलग-अलग और साल-दर-साल का विवरण है. लांबा ने TOI से कहा, "अदालत ने कहा है कि ब्याज बकाया है... हमारा मानना है कि यह रकम दिखाई जा रही रकम से कहीं ज्यादा है."
उन्होंने कहा, "देरी से भुगतान की मार छोटे किसानों पर सबसे अधिक पड़ी है, जिससे उन्हें खाद, मशीनरी और किराए के संसाधनों का खर्च उठाना पड़ रहा है" और साथ ही शादी-ब्याह जैसे घर के बड़े खर्च भी पूरे करने पड़ रहे हैं. किसान महंगाई और CNG व डीजल की बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए गन्ने का दाम लगभग 600 रुपये प्रति क्विंटल करने की भी मांग कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं."
कुछ किसान जिन्होंने शुरू में गन्ना सप्लाई किया था, वे अब... उनकी मौत हो गई. कई किसानों के पास उस समय की तौल पर्चियां (weighment slips) अभी भी हैं.
इस समय ने पुराने विवाद को एक नया राजनीतिक रंग भी दे दिया है. 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के नजदीक आने के साथ, "गन्ना" फिर से एक अहम मुद्दा बन रहा है. SP प्रमुख अखिलेश यादव ने तय समय पर गन्ने के भुगतान के मुद्दे पर किसानों और खाप प्रतिनिधियों से संपर्क किया है, जबकि RLD के जयंत चौधरी गन्ना अर्थव्यवस्था को लगातार प्रमुखता दे रहे हैं.