
देश में लंबे समय से 'Ease of Doing Business' को लेकर सुधारों की बात होती रही है, लेकिन अब इसी तर्ज पर खेती-किसानी को आसान बनाने की मांग भी काफी तेज हो गई है. दरअसल, 'Ease of Doing Farming' का मुद्दा अब किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है. सवाल उठ रहा है कि जब कारोबार को आसान बनाने के लिए हजारों सुधार किए जा सकते हैं, तो खेती-किसानी को आसान और सुविधाजनक बनाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जाते?
इसी मुद्दे को उठाते हुए कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने भी सरकार से सवाल किया है. 'जब ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' है, तो 'ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग' क्यों नहीं? उनका कहना है कि देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, फिर भी किसानों को आज भी जटिल प्रक्रियाओं, महंगी लागत और कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
इस बीच किसान नेता केदार सिरोही ने भी 'ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग' लागू करने की मांग को मजबूती से उठाया है. उनका कहना है कि खेती को आसान बनाने के लिए जमीनी स्तर पर बदलाव जरूरी है. किसानों को समय पर बिजली मिले, ट्रांसफॉर्मर बदलने में देरी न हो, स्लॉट बुकिंग की प्रक्रिया आसान हो और फसल बेचने में किसी तरह की रुकावट न आए, ऐसी व्यवस्था बनानी होगी. इसके साथ ही बीमा और क्लेम की प्रक्रिया को आसान बनाने, खाद और अन्य कृषि संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, सब्सिडी सीधे किसानों तक पहुंचाने और सरकारी प्रक्रियाओं को पारदर्शी और सरल बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 'ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग' को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा. इससे खेती की लागत कम होगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में सुधार होगा. साथ ही किसान आत्मनिर्भर बनेंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.
फिलहाल यह मुद्दा तेजी से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता जा रहा है. ऐसे में ये देखना लाजमी होगा कि आने वाले समय में सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं. लेकिन यह साफ है कि अगर 'ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग' की दिशा में ठोस पहल होती है, तो यह देश के करोड़ों किसानों के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.