
देश में अभी ठीक से खरीफ धान की बुवाई शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन केंद्र सरकार फसल की कटाई और इसकी पराली (अवशेष) के निपटान को लेकर अभी से सक्रिय नजर आ रही है. इसी दिशा में मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई. बैठक में आगामी सीजन के लिए राज्यों की तैयारियों और पराली प्रबंधन के स्थायी उपायों की समीक्षा की गई.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि वर्ष 2026-27 के लिए फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें पहली किस्त के रूप में 272.07 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं. इस राशि से 46 हजार से अधिक मशीनों का वितरण, 910 कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने और 141 पराली आपूर्ति श्रृंखला परियोजनाएं विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है.
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पराली जलाने की चुनौती से निपटने के लिए वर्ष 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना शुरू की गई थी. इसके तहत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और आईसीएआर को अब तक 4,266.47 करोड़ रुपये की सहायता दी जा चुकी है. इससे 3.54 लाख से अधिक मशीनें किसानों तक पहुंचाई गईं और 43,500 से ज्यादा कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किए गए.
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि पराली को बेकार अवशेष नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित किया जाए. इसके लिए बायोमास आधारित बिजली संयंत्र, संपीड़ित बायोगैस इकाइयां, एथेनॉल प्लांट और पेलेट निर्माण इकाइयों के जरिए पराली के उपयोग को बढ़ाने की रणनीति बनाई गई. सरकार का मानना है कि इससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर भी मिलेगा.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 14 जिलों की कम से कम 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ को सक्रिय करने की योजना बनाई गई है. इसका उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखना और समय रहते रोकथाम करना होगा. साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया है कि अगस्त 2026 से पहले मशीन वितरण और तैयारियां पूरी कर ली जाएं.
बैठक में कम समय में पकने वाली और कम पानी की जरूरत वाली धान किस्मों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया. सरकार का मानना है कि इससे धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच का समय बढ़ेगा और किसानों को पराली प्रबंधन के लिए अतिरिक्त अवसर मिलेगा. इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पराली आधारित ईंधन और उद्योगों की उपयोग क्षमता की समीक्षा करने की सलाह भी दी गई.
बैठक में तय किया गया कि पराली प्रबंधन को केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जन-जागरूकता, रियल टाइम निगरानी और आधुनिक तकनीकी उपायों को भी साथ लेकर काम किया जाएगा. किसानों को विकल्प उपलब्ध कराने और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने से पराली जलाने की घटनाओं को और घटाया जा सकता है.