
दुनिया के चावल बाजार में 2026-27 सीजन को लेकर नई चिंता उभर रही है. लंबे समय के बाद वैश्विक उत्पादन और खपत का संतुलन गड़बड़ाता दिख रहा है, जिससे आने वाले महीनों में कीमतें ऊपर जा सकती हैं. मौसम से जुड़े जोखिम, खाद की महंगाई, उपलब्धता की चिंता और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने बाजार को सतर्क कर दिया है. हालांकि, फिलहाल मांग सुस्त रहने और पिछले सीजन के बड़े स्टॉक उपलब्ध होने से कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई से काफी नीचे बनी हुई हैं.
‘बिजनेसलाइन’ के मुताबिक, अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा कि 2025-26 सीजन में वैश्विक चावल उत्पादन 537.8 मिलियन टन रहने का अनुमान था, जबकि 2026-27 में यह करीब 5 मिलियन टन घटकर लगभग 532.8 मिलियन टन रह सकता है. सबसे बड़ी गिरावट भारत में 2 मिलियन टन की बताई गई है. इसके अलावा म्यांमार में 1 मिलियन टन और अमेरिका में भी 1 मिलियन टन की कमी आने की आशंका है. दूसरी ओर वैश्विक खपत बढ़कर 541.4 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है यानी उत्पादन से करीब 8.6 मिलियन टन ज्यादा खपत होने की संभावना है.
वैश्विक स्टॉक भी 3.6 मिलियन टन घटकर 192.7 मिलियन टन रह सकता है. इसमें दक्षिण एशिया, खासकर भारत की बढ़ती मांग को सबसे बड़ा कारण माना गया है. भारत में चावल न सिर्फ मुख्य भोजन है बल्कि बढ़ती आबादी और बदलते खान-पान की आदतों के कारण उसकी घरेलू खपत भी लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि रिसर्च एजेंसियां आने वाले समय में कीमतों में मजबूती की उम्मीद जता रही हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, रिसर्च एजेंसी BMI (Fitch Solutions की इकाई) ने 2026 के लिए CBOT में लिस्टेड चावल वायदा की औसत कीमत 11.7 से 12.5 डॉलर प्रति cwt (45.36 किलोग्राम) के दायरे में रहने का अनुमान जताया है.
एजेंसी का कहना है कि मौसम संबंधी जोखिम और खाद की महंगाई और उपलब्धता की समस्या बाजार को सपोर्ट देगी. BMI ने अपने 2026 के वार्षिक औसत मूल्य पूर्वानुमान को पहले के 11.2 डॉलर प्रति cwt से बढ़ाकर 11.9 डॉलर प्रति cwt कर दिया है. भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उत्पादन, खपत और निर्यात के लिहाज से दुनिया में एक बड़ी हिस्सेदारी रखता है. BMI के अनुसार, 2026-27 में भारत का चावल उत्पादन करीब 2 प्रतिशत घट सकता है. फिर भी विशेषज्ञ बहुत बड़ी संकट की स्थिति नहीं मान रहे हैं, क्योंकि भारत के पास पिछले सीजन का पर्याप्त स्टॉक बफर के रूप में उपलब्ध है. यह स्टॉक किसी भी संभावित सप्लाई दबाव को संभालने में मदद करेगा.
BMI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत, वियतनाम और थाईलैंड की पहली मानसूनी फसल को फिलहाल स्थिर मौसम और पर्याप्त खाद उपलब्धता का सहारा मिल सकता है. ये तीनों देश मिलकर दुनिया के आधे से ज्यादा चावल निर्यात का हिस्सा रखते हैं. हालांकि, 2026 की चौथी तिमाही में अल नीनो का असर बढ़ने की आशंका है, जिससे भारत और थाईलैंड की दूसरी फसल और बांग्लादेश और इंडोनेशिया की मुख्य फसल पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है.
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की इकाई AMIS के मुताबिक, फिलहाल वैश्विक बाजार में मांग कमजोर बनी हुई है और शिपिंग बाधाओं के कारण कीमतें ज्यादा तेजी नहीं दिखा रही हैं. भारत की निर्यात दरें अभी स्थिर हैं, जबकि थाईलैंड के चावल के दाम 6 से 13 मई के बीच करीब 20 डॉलर प्रति टन बढ़े हैं. वियतनाम ने 1 अप्रैल के बाद से 60 डॉलर प्रति टन तक की बढ़ोतरी की है. भारत और पाकिस्तान में बढ़ोतरी 10 डॉलर प्रति टन से कम रही है.
इसके अलवा, पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सीधा असर चावल कारोबार पर भी दिख रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण इराक ने थाई चावल की खरीदारी रोक दी है. अगर यह तनाव लंबा खिंचा तो वैश्विक सप्लाई चेन पर और दबाव बढ़ सकता है. BMI का आकलन है कि भले ही कीमतों को समर्थन मिल रहा हो, लेकिन 2025-26 सीजन से बचे बड़े स्टॉक कीमतों को ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर तक जाने से रोकेंगे. इसके बावजूद अगर मौसम खराब रहा या भू-राजनीतिक हालात और बिगड़े तो वैश्विक चावल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है.