
छत्तीसगढ़ को यूं ही 'धान का कटोरा' नहीं कहा जाता. प्रदेश में धान की खेती की समृद्ध परंपरा और जैव-विविधता का अंदाजा रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के धान म्यूजियम से लगाया जा सकता है.इस म्यूजियम में धान की 23 हजार से ज्यादा दुर्लभ और पारंपरिक किस्मों के जर्मप्लाज्म वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किए गए हैं.
यह म्यूजियम सिर्फ धान की अलग-अलग किस्मों को देखने की जगह नहीं है, बल्कि देश की कृषि जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण जेनेटिक बैंक है. जलवायु परिवर्तन, बदलते मौसम और हाइब्रिड बीजों के बढ़ते चलन के बीच देशी धान की इन किस्मों का संरक्षण भविष्य की खेती और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
IGKV के धान म्यूजियम में ऐसी कई किस्में मौजूद हैं, जिनकी विशेषताएं किसी अजूबे से कम नहीं हैं.
सुआ पंखी धान का दाना अपने अनोखे आकार और रंग के कारण आकर्षण का केंद्र है. इसका दाना तोते के पंख जैसा दिखाई देता है.छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में इस धान को पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता रहा है.वहीं डोकरा डोकरी अपनी लंबाई के लिए जानी जाती है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका दाना करीब 14 मिलीमीटर तक लंबा हो सकता है, जबकि सामान्य धान के दाने की लंबाई करीब 6 से 8 मिलीमीटर होती है.अब इसकी खेती बेहद सीमित क्षेत्रों में रह गई है.
इसके बिल्कुल विपरीत केराडोम बेहद छोटे आकार का धान है.इसका दाना करीब 3.4 मिलीमीटर का बताया जाता है। बस्तर क्षेत्र में इसे 'मोती धान' के नाम से भी जाना जाता है.
इसी तरह हाथी पांजरा अपने भारी दानों के लिए खास है.इसके 1000 दानों का वजन करीब 100 ग्राम तक बताया जाता है, जबकि सामान्य धान की कई किस्मों में 1000 दानों का वजन करीब 20 से 25 ग्राम के आसपास होता है.
खजूर झोपा भी अपनी अलग पहचान रखता है। इसकी बालियां गुच्छों में इस तरह लटकती हैं कि दूर से देखने पर खेत में खजूर के पेड़ की झोप जैसी आकृति नजर आती है.
धान की इन पारंपरिक किस्मों की खासियत केवल उनके आकार, रंग और बनावट तक सीमित नहीं है. म्यूजियम में सुलधान, भैंसा कूंची, इलायची और आमा रूपी जैसी किस्मों को भी संरक्षित किया गया है.
IGKV के वैज्ञानिकों के अनुसार, कुछ पारंपरिक धान किस्मों में फ्लेवोनॉइड और फिनोल जैसे यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट गुणों पर वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन किया जाता है. आदिवासी समाज में कई पारंपरिक धान किस्मों का इस्तेमाल भोजन के साथ-साथ स्थानीय परंपरागत उपचारों में भी किया जाता रहा है.आमा रूपी जैसी कुछ किस्मों के बारे में स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी पारंपरिक मान्यताएं भी रही हैं. हालांकि इनके औषधीय प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक दावों के लिए अलग से प्रमाण और शोध जरूरी है.
धान की हर पारंपरिक किस्म अपने भीतर एक अलग जेनेटिक विशेषता लेकर चलती है. किसी किस्म में सूखा सहने की क्षमता हो सकती है, तो कोई अधिक पानी या बाढ़ जैसी परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. कुछ किस्मों में कीट और रोगों के प्रति प्राकृतिक सहनशीलता भी हो सकती है.
IGKV के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल के मुताबिक, नई और बेहतर धान किस्में विकसित करने में पारंपरिक किस्मों के जीन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में यदि ये देशी किस्में खत्म हो जाती हैं, तो भविष्य में वैज्ञानिकों के पास नई परिस्थितियों के अनुरूप फसल विकसित करने के लिए आनुवंशिक संसाधन भी कम हो जाएंगे.
इन दुर्लभ किस्मों का संरक्षण केवल वैज्ञानिकों और रिसर्च तक सीमित नहीं रहना चाहिए. संस्थान का उद्देश्य इन किस्मों को संरक्षित करने के साथ किसानों को इनके महत्व से जोड़ना और उपयुक्त किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना भी है.
कई पारंपरिक धान किस्में अपने स्वाद, सुगंध, रंग और पोषण संबंधी विशेषताओं के कारण अलग पहचान बना सकती हैं.यदि इनकी मांग विकसित की जाए और किसानों को बेहतर बाजार मिले, तो पारंपरिक धान की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी नया अवसर बन सकती है.
IGKV का धान म्यूजियम आने वाले समय में एग्रो-टूरिज्म और कृषि शिक्षा का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है. स्कूली बच्चों, कृषि छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों के लिए यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि एक ही फसल यानी धान की हजारों अलग-अलग आनुवंशिक किस्में भारत में मौजूद रही हैं.
फिलहाल म्यूजियम का मुख्य फोकस अनुसंधान और संरक्षण पर है. भविष्य में इसे आम लोगों के लिए अधिक व्यापक रूप से खोलने की योजना इसे कृषि पर्यटन के लिहाज से भी खास बना सकती है.
23000 से ज्यादा पारंपरिक धान किस्मों का यह संग्रह बताता है कि छत्तीसगढ़ की धान संस्कृति कितनी समृद्ध है. यह म्यूजियम केवल बीते दौर की यादों को सहेजने की जगह नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की खेती के लिए जेनेटिक विरासत को बचाने की कोशिश भी है.