
कहते हैं कि अगर किसी जलते हुए मुद्दे को हमेशा के लिए दफन करना हो, तो ब्यूरोक्रेसी को सौंपकर एक 'कमेटी' बना दो. कृषि मंत्रालय के एयरकंडीशन कमरों में बैठे बड़े साहबान ने इस कहावत को अक्षरशः सच साबित कर दिखाया है. साल 2022 में जब देश का किसान सड़कों पर था, तब आंदोलन की आग ठंडी करने के लिए सरकार और उसके आला अफसरों ने बड़ी चालाकी से 'संजय अग्रवाल कमेटी' का पासा फेंका था. आज ठीक 4 साल बाद इस कमेटी की हकीकत देश के करोड़ों अन्नदाताओं के मुंह पर करारा तमाचा है.
मंत्रालय की नाक के नीचे जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई से लगभग 54 लाख रुपये चाय, समोसों और हवाई दौरों में फूंक दी गई. मई 2026 तक सब-कमेटियों के नाम पर साहबानों ने 48 से अधिक बैठकें भी कर डालीं, लेकिन नतीजा? ढाक के वही तीन पात. रिपोर्ट के नाम पर एक पन्ना तक सामने नहीं आया.
इस पूरी कमेटी का सबसे कड़वा सच यह है कि कृषि मंत्रालय और ब्यूरोक्रेसी इसे सिर्फ टाइमपास का जरिया मान चुकी है. सूत्रों से जो बातें छनकर आ रही हैं, वे किसी को भी हैरान कर देंगी. कमेटी के कुछ रसूखदार सदस्य तो ऐसे हैं जो इसके गठन से लेकर आज तक एक बार भी मीटिंग में नहीं आए. उन्हें किसानों के मुद्दों से इतनी बेरुखी है कि उनके पास बैठने तक का समय नहीं है.
एमएसपी कमेटी में वही नौकरशाह हैं जो अपना वेतन, भत्ता और सरकारी सुख-सुविधाएं टाइम पर और पूरा चाहते हैं. उनके खुद के भत्तों में एक दिन की भी देरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब बात देश के किसान को उसकी फसल की सही कीमत देने की आती है, तो इनके पेन की स्याही सूख जाती है.
ये साहबान सिर्फ 'मीटिंग-मीटिंग' का खेल खेल रहे हैं ताकि जनता और सरकार को दिखाया जा सके कि काम हो रहा है. हकीकत यह है कि चार साल की ऐशपरस्ती के बाद भी आज धरातल पर नतीजा बिल्कुल जीरो है. आइए, कृषि मंत्रालय के इन सुस्त और लापरवाही से भरे नीति-निर्माताओं को इतिहास का आईना दिखाते हैं, जो साफ बताता है कि जब नीयत साफ हो तो काम कैसे होता है, और जब सिर्फ मलाई काटनी हो तो फाइलें कैसे घूमती हैं.
जब देश के किसानों को कर्ज और आत्महत्या के दलदल से निकालना था, तब डॉ. एमएस स्वामीनाथन और तत्कालीन टीम ने फाइलों को दफ्तरों में सड़ने नहीं दिया.
किसानों की आय दोगुनी करने जैसे बेहद पेचीदा और देशव्यापी मिशन पर काम करने वाली अशोक दलवाई समिति के सामने भी चुनौतियां कम नहीं थीं. कृषि राज्यों का विषय है, हजारों अड़चनें थीं, लेकिन तब की ब्यूरोक्रेसी ने कछुआ चाल को शर्मसार नहीं किया.
अब बात उस कमेटी की, जिसे इतिहास 'किसानों के साथ ब्यूरोक्रेसी का मजाक' कहेगा. पूर्व कृषि सचिव संजय अग्रवाल की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने सुस्ती के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं.
कृषि मंत्रालय इस कमेटी की बैठकों की जानकारी को 'गोपनीय' बताकर दबा रहा है. आखिर ऐसा क्या छुपाया जा रहा है? सच तो यह है कि इस कमेटी के मूल एजेंडे से 'एमएसपी की कानूनी गारंटी' शब्द को ही गायब कर दिया गया था. जब देश की संसदीय स्थायी समिति चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि कानूनी गारंटी के बिना किसान नहीं बचेगा, तब मंत्रालय के ये आला अफसर वातानुकूलित कमरों में बैठकर सिर्फ तारीख पर तारीख दे रहे हैं.
बहरहाल, स्वामीनाथन और दलवाई कमेटी के दस्तावेज गवाही दे रहे हैं कि जब साहबानों की नीयत में खोट न हो, तो दो साल का वक्त एक नया इतिहास लिखने के लिए बहुत बड़ा होता है. लेकिन जब केवल चुनाव काटने हों, आंदोलन टालना हो और किसानों को धोखा देना हो, तो 4 साल का वक्त भी कम पड़ता है. कृषि मंत्रालय के अधिकारियों की यह सुस्ती साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि देश के अन्नदाता के साथ की जा रही खुली हठधर्मिता और विश्वासघात है.