लेज चिप्स वाले आलू पर सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई, पेप्सिको के अधिकार बनाम किसानों के हक पर छिड़ी बहस

लेज चिप्स वाले आलू पर सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई, पेप्सिको के अधिकार बनाम किसानों के हक पर छिड़ी बहस

लेज चिप्स में इस्तेमाल होने वाली आलू की विशेष किस्म FL 2027 (FC5) को लेकर पेप्सिको और किसान संगठनों के बीच कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. मामला कंपनी के ब्रीडर राइट्स और किसानों के बीज उगाने, बचाने व बेचने के अधिकारों के टकराव से जुड़ा है.

The petitioners said they were "forced" to approach the Supreme Court because they felt justice was not served by the new Act and the directions in the Supreme Court's May 2025 verdict were not implemented. The petitioners said they were "forced" to approach the Supreme Court because they felt justice was not served by the new Act and the directions in the Supreme Court's May 2025 verdict were not implemented.
संजय शर्मा
  • New Delhi,
  • Aug 05, 2026,
  • Updated Aug 05, 2026, 1:34 PM IST

पेप्सिको के उत्पाद 'लेज' चिप्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले विशेष किस्म के आलू FL 2027 (FC5) के पेटेंट और अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में पहुंच गई है. किसान संगठनों और उसके कार्यकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें पेप्सिको (PepsiCo) के इस आलू की किस्म पर पौध संरक्षण पंजीकरण अधिकार (Breeder Rights) को बहाल कर दिया गया था.

​यह पूरा मामला FL 2027 नामक आलू की एक खास किस्म से जुड़ा है. यह आम रसोइयों में इस्तेमाल होने वाला आलू नहीं है, बल्कि इसे विशेष रूप से चिप्स और वेफर्स बनाने के लिए तैयार किया गया है. इसमें नमी (moisture) की मात्रा कम होती है, जो चिप्स निर्माण के लिए व्यावसायिक रूप से उपयुक्त है.

आलू पर पेप्सिको का दावा

​पेप्सिको का दावा है कि इस किस्म को उन्होंने तैयार किया है और पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत इस पर उनका विशेष अधिकार है. दूसरी ओर, किसान संगठनों का कहना है कि भारतीय कानून देश के किसानों को बीजों को उगाने, सहेजने और बेचने का अटूट अधिकार देता है. ​पेप्सिको की दलील है कि इसके ​ब्रीडर का एक्सक्लूसिव अधिकार उसके पास है. कंपनी के वकील के अनुसार, 2016 में मिला रजिस्ट्रेशन उन्हें इस किस्म को उगाने, बेचने और बाजार में उतारने का पूरा अधिकार देता है. बिना अनुमति कोई अन्य इसे नहीं उगा सकता.

पेप्सिको के वकील ने सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि इस आलू का लाइसेंस 2016 में मिला था. रजिस्ट्रेशन इस किस्म पर पूरे अधिकार देता है. अगर कोई और इस खास किस्म को उगाना चाहता है, तो उन्हें पेप्सिको से इजाज़त लेनी होगी. वकील ने कोर्ट को बताया, ये रोजाना खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाले आम आलू नहीं हैं. इन्हें जेनेटिकली इंजीनियर किया गया है ताकि ये चिप्स और वेफर्स के लिए काम आ सकें. रजिस्ट्रेशन ब्रीडर (किस्म विकसित करने वाले) को इस किस्म को पैदा करने, बेचने और मार्केट करने का एक्सक्लूसिव अधिकार देता है.

पेप्सिको के इस तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, आप यह रजिस्ट्रेशन पाने के हकदार कैसे हैं? आलू के मामले में 'ब्रीडर' क्या होता है? आप किसी पौधे की ब्रीडिंग कैसे करते हैं? पेप्सिको के वकील ने कोर्ट को रजिस्ट्रेशन प्रोसेस और योग्यताओं के बारे में बताया.

ऐसा ही मामला BT2 कॉटन के मामले में भी सामने आया था. पेप्सिको के वकील ने कहा, उन्होंने हमारे खिलाफ केस किया और दावा किया कि हम लाइसेंस का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि हम उन किसानों के खिलाफ केस कर रहे हैं जो भारत में आलू की इसी किस्म को उगा रहे हैं. लेकिन हमने उन किसानों के खिलाफ केस किया जो राइवल चिप्स बनाने वाली कंपनियों के कहने पर यह आलू उगा रहे थे. 'प्लांट वैराइटीज़ अथॉरिटी' ने इन शिकायतों के आधार पर हमारा रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया. हमने उसे चुनौती दी है.

​पेप्सिको का तर्क है कि वे आम छोटे किसानों के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उन मामलों में कार्रवाई कर रहे थे जहां दूसरी प्रतिस्पर्धी चिप्स निर्माता कंपनियों के इशारे पर इस आलू की कमर्शियल खेती कराई जा रही थी.

​किसानों और याचिकाकर्ताओं का पक्ष

​किसानों और याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि कृषक अधिकार कानून की ​धारा 39 के तहत उनका विशेषाधिकार पेप्सिको के एकाधिकार पर भारी है. वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्विस और याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कानून की धारा 39(1)(iv) किसानों को स्पष्ट सुरक्षा देती है. किसान किसी भी संरक्षित किस्म के बीज को उगाने, सहेजने, आपस में बदलने और बेचने के लिए स्वतंत्र हैं, जब तक कि वे उसे 'ब्रांडेड बीज' के रूप में न बेचें.

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा, अगर सेक्शन 39 है तो किसानों के अधिकार सुरक्षित हैं.. तो क्या रजिस्ट्रेशन जारी रह सकता है? हमें भारत सरकार, अथॉरिटी से पूछना होगा. रजिस्ट्रेशन होने के बावजूद आप किसानों की सुरक्षा कैसे करते हैं? 

सिर्फ इसलिए कि मुकदमे दायर किए गए, इसका मतलब यह नहीं है कि वे परेशान करने के लिए थे. क्या सिर्फ मुकदमे दायर होने से हम कह सकते हैं कि यह जनहित के खिलाफ है? सिर्फ मुकदमा दायर करने से ही यह उत्पीड़न नहीं हो जाता. हम कह सकते हैं कि कानून ने खुद किसानों को सुरक्षा दी है. कानूनी प्रावधान में एक 'नॉन-ऑब्सटैंट क्लॉज' (विशेष प्रावधान) शामिल है. इसका मतलब है कि रजिस्ट्रेशन के बावजूद किसान उत्पाद का इस्तेमाल करने, उसे बोने, काटने और बेचने के हकदार हैं. अपना बचाव करने के लिए आपको कोर्ट में अपना लिखित बयान दाखिल करना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम किसानों के हितों की रक्षा करेंगे. कोई भी किसानों को डराएगा-धमकाएगा नहीं. पेप्सिको प्लांट वैरायटी का अपना रजिस्ट्रेशन बनाए रखेगी, लेकिन किसानों के कानूनी अधिकारों की रक्षा की जाएगी. सुनवाई करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने पूछा, वैसे हमें कुछ बताइए, किसानों को ये बीज कहां से मिले? इस पर पेप्सिको के वकील ने जवाब देते हुए कहा, यह किस्म चिली में विकसित की गई थी.

इस पूरे मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी खाद्य फसल पर कॉर्पोरेट का पूर्ण एकाधिकार भारतीय कृषि व्यवस्था और किसानों की आजीविका के लिए खतरा है.

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