Iranian Saffron: अंदरूनी उथल-पुथल से जूझ रहे ईरान के पास है 'केसर का भंडार', जानें कश्‍मीर से कनेक्‍शन

Iranian Saffron: अंदरूनी उथल-पुथल से जूझ रहे ईरान के पास है 'केसर का भंडार', जानें कश्‍मीर से कनेक्‍शन

ईरान दुनिया के 85 से 90 प्रतिशत केसर का उत्पादन करता है. खोरासान क्षेत्र इसकी खेती का मुख्य केंद्र है. 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में केसर के दाम ऊंचे बने हुए हैं. भारत से इसका ऐतिहासिक और व्यापारिक रिश्ता जुड़ा है...

Iranian KesarIranian Kesar
प्रतीक जैन
  • Noida,
  • Jan 10, 2026,
  • Updated Jan 10, 2026, 8:25 PM IST

ईरान इस समय आंतरिक विरोध-प्रदर्शनों, राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट की आशंकाओं के बीच वैश्विक चर्चा में है. भारत के ईरान के साथ अच्‍छे व्‍यापारिक रिश्‍ते हैं और दोनों देश एक दूसर को कई उत्‍पादों का आयात-निर्यात करते हैं. साथ ही ईरान दुनियाभर में केसर (Saffron) ‘रेड गोल्‍ड’ के उत्‍पादन और सप्‍लाई के लिए मशहूर है. ऐसे में जब यह देश अस्थिरता से गुजर रहा है तो केसर की कीमतों पर इसका साफ असर नजर आ रहा है. ईरानी केसर का भारत से भी पुराना सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध रहा है. माना जाता है कि ऐतिहासिक व्यापार मार्गों के जरिए ही केसर कश्मीर पहुंचा, जहां आज “कश्मीरी केसर” अपनी अलग पहचान रखता है. हालांकि, आज भारत और ईरान का रिश्ता केवल परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि मजबूत व्यापारिक आंकड़ों में भी दिखता है.

दुनिया का कुल उत्‍पादन 85 प्रत‍िशत से ज्‍यादा

दुनिया का सबसे महंगा मसाला माने जाने वाला केसर ईरान की खेती, ग्रामीण रोजगार और निर्यात आय का अहम स्तंभ है. अंतरराष्ट्रीय संस्था FAO के मुताबिक, दुनिया के कुल केसर उत्पादन का करीब 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा अकेला ईरान पैदा करता है. कुछ आकलनों में यह हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी अधिक बताई जाती है. 

ईरान का मुख्य केसर उत्पादक क्षेत्र खोरासान प्रांत है, जहां की जलवायु, मिट्टी और पारंपरिक खेती पद्धति केसर के लिए आदर्श मानी जाती है. ईरान में हर साल हजारों टन केसर का उत्पादन होता है, जिसका आर्थिक मूल्य बेहद ऊंचा होता है. एक किलो शुद्ध केसर की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये तक है. यही वजह है कि केसर को ईरान की “रेड गोल्ड इकॉनमी” भी कहा जाता है.

ईरान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है केसर

ईरान में केसर की खेती सिर्फ निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लाखों छोटे किसानों की आजीविका का आधार है. FAO के अनुसार, केसर उत्पादन में बड़ी इंडस्ट्री नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम किसान प्रमुख भूमिका निभाते हैं. राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंधों और आंतरिक तनाव के बावजूद केसर ऐसा सेक्टर है, जिसने ईरान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लगातार सहारा दिया है.

भारत-ईरान कृषि व्यापार

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने एक साल (वित्‍त वर्ष 2024-25) में  ईरान को 8,919 करोड़ रुपये से ज्यादा के कृषि उत्पादों का निर्यात किया है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बासमती चावल का है. भारत ने एक साल में ईरान को 6,374 करोड़ रुपये मूल्य का करीब 8.55 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात किया और यह देश भारतीय बासमती का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है, जिसकी कुल हिस्सेदारी 12.67 प्रतिशत है.

इसके अलावा भारत ने ईरान को 469 करोड़ रुपये के ताजा फल, 320 करोड़ रुपये की चाय, 591 करोड़ रुपये की खली (पशुआहार), 271 करोड़ रुपये की दालें, 247 करोड़ रुपये के मसाले निर्यात किए. इस निर्यात में मूंगफली, भैंस का मीट, प्रोसेस्ड फूड, आयुष और हर्बल उत्पाद, नॉन-बासमती चावल, कॉफी, डेयरी उत्पाद और प्रोसेस्ड फल-जूस भी इस व्यापार का अहम हिस्सा हैं.

क्यों अहम है ईरान का केसर

आज जब ईरान राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है, तब केसर जैसी हाई-वैल्यू फसल उसकी अर्थव्यवस्था के लिए स्थिरता का संकेत देती है. वैश्विक केसर बाजार में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत है कि वहां की किसी भी बड़ी राजनीतिक या सामाजिक हलचल का असर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई और कीमतों पर पड़ता है.

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