
गेहूं भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है, लेकिन हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने इसकी खेती के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं. इन्हीं में से एक उभरता हुआ संकट है 'फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट' (FHB), जिसे 'स्कैब' रोग भी कहा जाता है. यह रोग मुख्य रूप से फ्यूजेरियम ग्रामिनीयरम नामक कवक (फंगस) के कारण फैलता है. आज के समय में बेमौसम बारिश, हवा में बढ़ती नमी और खेतों में फसल अवशेषों को छोड़ने की बदलती पद्धतियों के कारण यह बीमारी तेजी से पांव पसार रही है. यह रोग न केवल गेहूं की पैदावार को कम करता है, बल्कि दानों की गुणवत्ता को भी पूरी तरह नष्ट कर देता है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह कवक दानों के भीतर 'मायकोटॉक्सिन' जैसे जहरीले तत्व पैदा करता है, जो इंसानों और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक साबित हो सकते हैं. इसलिए, इस रोग को समझना और समय रहते पहचानना हर किसान के लिए अनिवार्य हो गया है.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के पौध सुरक्षा विभाग के हेड डॉ एस. के. सिंह ने कहा, खेत में इस रोग की पहचान करना काफी सरल है, बशर्ते किसान अपनी फसल का नियमित निरीक्षण करें. इस बीमारी का सबसे प्रमुख लक्षण गेहूं की बालियों का समय से पहले सफेद हो जाना है. आमतौर पर जब पूरी फसल हरी होती है, तब संक्रमित बालियों के कुछ हिस्से या पूरी बाली सूखी और सफेद दिखने लगती है. यदि मौसम में अधिक नमी या ओस हो, तो बालियों के दानों के आधार पर गुलाबी या हल्के नारंगी रंग की फफूंद स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है.
संक्रमित बालियों के दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, वे सिकुड़ जाते हैं. वजन में हल्के होते हैं और देखने में चाक की तरह सफेद या फीके पड़ जाते हैं, जिन्हें 'टॉम्बस्टोन कर्नेल' कहा जाता है. ऐसे दानों की अंकुरण क्षमता बहुत कम हो जाती है, जिससे वे बीज के रूप में इस्तेमाल करने लायक नहीं बचते. खेत में असमान रूप से फसल का पकना भी इस संक्रमण का एक बड़ा संकेत है.
डॉ एस. के. सिंह के अनुसार, फ्यूजेरियम रोग का चक्र काफी जटिल है और यह मुख्य रूप से पिछली फसल (जैसे मक्का या गेहूं) के बचे हुए अवशेषों पर जीवित रहता है. जब मौसम में तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है और आर्द्रता 90 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तो यह कवक सक्रिय हो जाता है. गेहूं की फसल के लिए 'फूल आने की अवस्था' (Anthesis) इस रोग के प्रति सबसे संवेदनशील होती है. इस समय होने वाली बारिश या भारी ओस कवक के बीजाणुओं को हवा के जरिए बालियों तक पहुंचा देती है.
गेहूं के परागकोष (Anthers) इस कवक के लिए भोजन का काम करते हैं, जिससे संक्रमण तेजी से बाली के अंदर तक फैल जाता है. यदि घनी बुवाई की गई हो और पौधों के बीच हवा का संचार कम हो, तो यह बीमारी एक महामारी का रूप ले सकती है और देखते ही देखते पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेती है.
डॉ सिंह ने बताया, यह रोग किसान को दोहरी मार देता है. पहला नुकसान पैदावार में भारी गिरावट के रूप में होता है, क्योंकि दाने हल्के और खोखले रह जाते हैं जिससे फसल का कुल वजन घट जाता है. दूसरा और अधिक गंभीर नुकसान दानों की गुणवत्ता और बाजार मूल्य में कमी है. संक्रमित दानों में डिऑक्सीनिवालेनॉल (DON) जैसे विषैले तत्व जमा हो जाते हैं. यदि ऐसे अनाज का उपयोग आटे या पशु आहार में किया जाए, तो यह पाचन तंत्र और प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे संक्रमित अनाज की मांग नहीं होती, जिससे निर्यात में बाधा आती है और किसानों को फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता. कई बार कम संक्रमण दिखने पर भी जहरीले तत्वों की मात्रा अधिक हो सकती है, जो इसे एक "साइलेंट किलर" बीमारी बनाता है.
इस विनाशकारी रोग से बचने के लिए किसानों को एक साझा रणनीति यानी 'समेकित रोग प्रबंधन' अपनाना चाहिए. सबसे पहले, उन किस्मों का चुनाव करें जिनमें इस रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता हो. लगातार गेहूं या मक्का उगाने के बजाय फसल चक्र में दलहन (दालें) और तिलहन को शामिल करें. खेत की गहरी जुताई करें ताकि संक्रमित अवशेष मिट्टी में दब जाएं. वैज्ञानिक सलाह के अनुसार, फूल आने की शुरुआती अवस्था में टेबुकोनाजोल या प्रोटिओकोनाजोल जैसे फफूंदनाशकों का छिड़काव बेहद प्रभावी रहता है.
इसके साथ ही 'ट्राइकोडर्मा' जैसे जैविक एजेंटों का उपयोग भी मिट्टी की सेहत सुधारने और रोग रोकने में मददगार है. कटाई के बाद अनाज को अच्छी तरह सुखाकर (14% से कम नमी पर) सुरक्षित भंडारण करें. आधुनिक तकनीक और सही जानकारी के तालमेल से ही हम गेहूं की फसल को इस संकट से बचाकर सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं.