
कपास की जो फसल कभी किसानों की समृद्धि का प्रतीक थी, वह आज 'लॉस मेकिंग' सौदा बन गई है. पिछले पांच साल में कपास की खेती का 20 लाख हेक्टेयर रकबा कम होना महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस टूटते भरोसे की कहानी है जिसने भारत को निर्यातक से आयातक बना दिया है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत का कपास उत्पादन 2013-14 में हासिल की गई ऊंचाइयों से लगातार नीचे गिर रहा है. उत्पादकता विश्व औसत से भी कम है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसका पहला जवाब है-तकनीक. दूसरा प्राइस और तीसरा पॉलिसी. इन तीन वजहों ने भारत की कपास क्रांति की धार कुंद कर दी है, जो 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश की इकोनॉमी के लिए खतरनाक है.
इसी बात को समझते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने 6 मई को कपास उत्पादकता मिशन को पास किया. जिसका लक्ष्य वर्ष 2031 कपास की उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाना है. इसके साथ ही कपास का कुल उत्पादन 498 लाख बेल (170 किलो=1 बेल) तक ले जाने की योजना है. सरकार का मानना है कि इससे न सिर्फ किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे, बल्कि घरेलू कपास उद्योग भी मजबूत होगा. मिशन को सफल बनाने के लिए राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की मदद ली जाएगी. शुरुआती चरण में देश के 14 राज्यों के 140 जिलों को इस अभियान के लिए चुना गया है. इन इलाकों में नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा और करीब 2000 जिनिंग और प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां भी लगाई जाएंगी. दावा है कि इस मिशन से करीब 32 लाख किसान सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे.
सरकारी दावे हकीकत में बदलेंगे या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन जिन तीन वजहों से भारत में कॉटन क्राइसिस पैदा हुआ है उन्हें सिलसिलेवार समझ लेते हैं.
भारत में कपास की कुछ बेहतरीन किस्में पहले से ही मौजूद रही हैं. लेकिन समय के साथ यह पाया गया कि उससे उत्पादकता में उतनी वृद्धि नहीं हुई कि जितनी बीटी कॉटन (Bt Cotton) यानी बैसिलस थुरिंगिएन्सिस कॉटन से होती है. इस तकनीक को सबसे पहले अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो (Monsanto) ने विकसित किया था. उसने मिट्टी के बैक्टीरिया (Bacillus thuringiensis) से जीन निकालकर उसे कपास के पौधे में सफलतापूर्वक डाला था. बीटी कॉटन की खेती सबसे पहले 1996 में अमेरिका में शुरू हुई थी. भारत में यह तकनीक 2002 में आई, जिसे मोनसेंटो ने भारतीय कंपनी माहिको (Mahyco) के साथ मिलकर पेश किया था.
भारत में बीटी कॉटन (Bt Cotton) की शुरुआत का सफर काफी चर्चाओं और बदलावों भरा रहा है. इससे जुड़े विवाद आज तक कायम हैं. भारत सरकार ने मार्च 2002 में पहली बार बीटी कॉटन की व्यावसायिक खेती को मंजूरी दी. यह भारत की पहली और अब तक की एकमात्र जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसल है. भारत में 2002 में पहली बार बीजी-1 (Bollgard I) टेक्नोलॉजी के साथ बीटी कॉटन को व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी दी गई थी. मोनसेंटो द्वारा विकसित 'बोल्गार्ड-I' (Bollgard I) में Cry1Ac जीन का उपयोग किया गया था. Cry1Ac एक विशिष्ट जीन है जो 'बैसिलस थुरिंगिएन्सिस' (Bacillus thuringiensis - Bt) नामक बैक्टीरिया से प्राप्त किया जाता है.
यह जीन कपास के पौधे के भीतर 'क्राई प्रोटीन' (Cry protein) पैदा करता है, जो एक प्राकृतिक कीटनाशक (Biopesticide) के रूप में कार्य करता है. Cry1Ac जीन मुख्य रूप से बॉलवर्म (अमेरिकन, चितकबरी और गुलाबी सुंडी) को कंट्रोल करने के लिए प्रभावी है. जब कोई सुंडी कपास के पत्तों या फूलों को खाती है, तो यह प्रोटीन उसके पेट के अल्कलाइन मीडियम में सक्रिय हो जाता है. इससे कीट की पाचन नली में छेद हो जाते हैं, वह खाना बंद कर देता है. इस तरह उसकी मृत्यु हो जाती है. यह प्रोटीन केवल कुछ कीटों के लिए विषैला होता है. यह मनुष्यों, पशुओं और अन्य लाभदायक कीटों के लिए पूरी तरह हानिरहित माना जाता है.
बहरहाल, Bt कपास को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने से 2013-14 तक हमारी कॉटन उत्पादकता 565.72 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई. उत्पादन बढ़कर 398 गांठ हो गया. यह भारत का अधिकतम कपास उत्पादन के तौर पर रिकॉर्ड किया गया. इसका मतलब ऐसा नहीं है कि भारत में स्थानीय तौर-तरीकों से कपास की उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास नहीं हुए हों. यहां पर H-4, वरलक्ष्मी और अन्य हाइब्रिड ने 1970-71 और 2001-02 के बीच राष्ट्रीय औसत पैदावार को 127 किलोग्राम से बढ़ाकर 308.65 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाने में मदद की. भारत में कपास की इन बेहतरीन किस्मों को विकसित करने वाले विशेषज्ञों का जिक्र करना भी बेहद जरूरी है.
डॉ. सीटी पटेल ने 1970 में दुनिया की पहली हाइब्रिड कपास किस्म "H-4" विकसित की थी. उनको भारतीय कपास अनुसंधान के क्षेत्र का 'महान नायक' के तौर पर जाना जाता है. सूरत के मुख्य कपास अनुसंधान केंद्र (गुजरात कृषि विश्वविद्यालय) में काम करते हुए डॉ. पटेल ने दो अलग-अलग गुणों वाली किस्मों को क्रॉस-ब्रीड करवाकर 'H-4' किस्म तैयार की थी. यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की पहली व्यावसायिक हाइब्रिड कपास किस्म थी. इससे पहले दुनिया भर में यह माना जाता था कि कपास का हाइब्रिड बीज बड़े पैमाने पर तैयार करना संभव नहीं है. H-4 के आने से भारत में कपास की उत्पादकता में जबरदस्त उछाल आया.
इस किस्म को विकसित करने की प्रक्रिया बहुत मेहनत वाली थी, क्योंकि इसमें फूलों का हाथ से संकरण करना पड़ता था, जो आज भी भारत में हाइब्रिड बीज उत्पादन का आधार है. डॉ. सीटी पटेल की यह 'देसी तकनीक' भारत की पहली कपास क्रांति थी. आज जब हम तकनीक की बात कर रहे हैं और कह रहे हैं कि "बीटी कॉटन तकनीक" पुरानी पड़ गई है, तो हमें डॉ. पटेल जैसे वैज्ञानिकों की याद आती है जिन्होंने विदेशी तकनीक से पहले भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया था. इसलिए अपनी किस्मों को कमतर करके बीटी को बहुत महान बताने की जरूरत नहीं है. इसके बाद 1972 में धारवाड़ (कर्नाटक) में 'वरलक्ष्मी' नाम की कॉटन किस्म विकसित हुई. जिसे डॉ. बीएच कटारकी ने विकसित किया.
हमने देसी किस्मों और अपनी बनाई कपास की हाइब्रिड किस्मों को साइडलाइन करके बीटी को अपने खेतों तक पहुंचाया. इसमें कंपनियों का भी बहुत बड़ा हित छिपा हुआ था. तो फिर सवाल यह है कि बीटी कॉटन क्यों फेल हो गया? क्यों बीटी के बावजूद भारत मे कपास की खेती पतन की ओर जा रही है?
इसका जवाब हमने साउथ एशिया बायो टेक्नॉलोजी सेंटर के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी से तलाशने की कोशिश की. चौधरी ने कहा कि भारत में कॉटन उत्पादन एक विषम परिस्थिति से गुजर रहा है. जिसमें सबसे बड़ा रोल गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का है. देश के अधिकांश कॉटन उत्पादक सूबों में इस कीट ने तबाही मचाई हुई है. महंगे कीटनाशकों का छिड़काव करने के बावजूद इस पर काबू नहीं पाया जा सका है. क्योंकि यह कीट कॉटन के बॉल के अंदर घुस जाता है. उस पर छिड़काव का कोई असर नहीं होता. इसका कंट्रोल न होने से काफी किसान हताश हैं और वे कॉटन की खेती कम कर रहे हैं. किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले बीज नहीं मिले, इसका भी उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है.
भारत में 2002 में बीटी कॉटन की शुरुआत हुई, लेकिन उसके कुछ ही वर्षों में 'गुलाबी सुंडी' (Pink Bollworm) ने Cry1Ac जीन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी शुरू कर दी. जो बीटी कॉटन गुलाबी सुंडी के लिए जहर के तौर पर आया था, उसे ही गुलाबी सुंडी ने अपना आहार बनाना शुरू कर दिया.
वैज्ञानिकों ने पाया कि यह जीन अकेले गुलाबी सुंडी पर उतना प्रभावी नहीं रहा. इसी समस्या से निपटने के लिए 2006 में कॉटन की नई किस्मों में Cry1Ac के साथ Cry2Ab जैसे अतिरिक्त जीन जोड़े गए हैं (जैसे Bollgard-II), ताकि कॉटन के लिए खतरनाक कीटों पर दोहरा प्रहार किया जा सके.
इसके बाद कपास की खेती में किसी नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं किया गया. यानी कॉटन के बीजों में अंतिम बार नई टेक्नोलॉजी 2006 में ही आई थी. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्पादन में तेजी से गिरावट हो रही है तो उसकी एक बड़ी वजह गुलाबी सुंडी है. महंगे कीटनाशकों का छिड़काव करने के बावजूद इस पर काबू नहीं पाया जा सका है. क्योंकि इसके बीजों में समय के साथ बदलाव नहीं किया गया. गुलाबी सुंडी ने बीटी कॉटन के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है. इसलिए इसकी खेती बर्बाद हो रही है. कपास की खेती एक कीड़े की वजह से तबाही के कगार पर खड़ी है.
गुलाबी सुंडी पहले एक माइनर कीट था. लेकिन, बाद में यह परेशानी का सबब बन गया. साल 2015 में गुजरात और महाराष्ट्र से शुरू हुआ इसका प्रकोप उत्तर भारत के खेतों तक पहुंचकर तबाही मचा रहा है. यह मोनोफैगस कीट है. यानी एक ही फसल को खाता है. कपास इसका प्रिय भोजन है. नान बीटी पौधों की संख्या नहीं होने की वजह से इस कीट ने बीटी कॉटन के खिलाफ अपनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है और अब यह इसे ही खा रहा है, जिससे पैदावार पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. यह कई क्षेत्रों में 30 से 90 फीसदी तक फसल को नुकसान पहुंचा रहा है.
हालांकि, जब 2002 में पहली पीढ़ी का बीटी कॉटन पेश किया गया था, तब यह नियम बनाया गया था कि बीटी कपास के खेत के चारों ओर कम से कम 20% क्षेत्र में गैर-बीटी बीज लगाए जाने चाहिए. इससे बीटी के प्रति गुलाबी सुंडी प्रतिरोध विकसित नहीं कर पाता. इस तकनीक को 'रिफ्यूजी सीड" (Refuge Seeds) तकनीक कहा गया. इसके तहत कॉटन के खेत में एक 'रिफ्यूज एरिया' बनाया जाना था. इसका मकसद कपास की फसल को गुलाबी सुंडी और अन्य कीटों से बचाना और उन्हें बीटी बीज के प्रति प्रतिरोधी होने से रोकना था.
इसका मुख्य तरीका यह है कि बीटी कपास के साथ कुछ गैर-बीटी (सामान्य) पौधे लगाए जाते हैं, जहां कीट बिना जहर के जीवित रह सकें. जब इन सामान्य पौधों पर पलने वाले 'संवेदनशील' कीट बीटी पौधों पर बचने वाले 'प्रतिरोधी' कीटों के साथ प्रजनन करते हैं, तो उनकी अगली पीढ़ी फिर से बीटी के प्रति कमजोर पैदा होती है, जिससे बीटी बीज की कीटों से लड़ने की शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.
लेकिन दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर न तो सरकार ने ध्यान दिया, न किसानों ने और न कृषि वैज्ञानिकों ने. यहां कृषि मंत्रालय और ICAR का एक्सटेंशन सिस्टम एसी कमरों में कैद रहा और इस तरह जानकारी के अभाव के कारण किसानों ने पूरे खेत में सिर्फ बीटी बीज ही लगाए. वरना शायद ग़ुलाबी सुंडी का तांडव नहीं देखने को मिलता.
हालांकि, 2006 में जब दूसरी पीढ़ी का बीटी कॉटन (Bollgard II) आया, तब भी यही नियम लागू रहे. लेकिन कीटों में प्रतिरोध बढ़ने के कारण बाद में 'रिफ्यूज-इन-बैग' (RIB) तकनीक को मंजूरी दी गई ताकि किसान चाहकर भी इसे नजरअंदाज न कर सकें. आजकल कंपनियों ने बीज के पैकेट में ही 5 से 10 फीसदी गैर-बीटी बीज पहले से मिलाकर देना शुरू कर दिया है, ताकि किसानों को अलग से कतारें न लगानी पड़ें. लेकिन, "अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत. " बहुत देर हो चुकी है. गुलाबी सुंडी की कई पीढ़ियां बीटी कॉटन के प्रति प्रतिरोध विकसित कर चुकी है. इसलिए अब अब इसका कोई फायदा नहीं.
कॉटन का एरिया घट रहा है और उत्पादन में गिरावट आ रही है तो इसकी वजह सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं है. रकबा घटने की एक वजह गुलाबी सुंडी तो है, लेकिन दूसरी वजह यह है कि अब किसानों को बाजार में अच्छा दाम नहीं मिल रहा है. पिछले साल कई सूबों में किसानों को कॉटन का एमएसपी तक नसीब नहीं हुआ. कपास उत्पादक किसानों को 2021 में 12000 रुपये प्रति क्विंटल तक का रेट मिला था, 2022 में 8000 रुपये तक का भाव मिला, लेकिन उसके बाद दाम गिरता चला गया. इसका भाव 4000 और 5000 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गया. इसलिए रकबा भी कम होता चला गया. इसमें कोई दो राय नहीं कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री अक्सर कपास का दाम गिराने की कोशिश में लगी रहती है.
सवाल यह है कि अगर किसानों को दाम ही नहीं मिलेगा तो फिर वो खेती क्यों करेंगे? इस समय यानी मई 2026 में कॉटन का एमएसपी 7710 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन, बाजार भाव मात्र 4800 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है. पिछले लगभग साल भर से कपास के दाम एमएसपी से नीचे हैं. लेकिन, इसकी खेती करने वाले किसानों का कोई माई-बाप नहीं है. किसान जो खेत में कृषि इनपुट डाल रहा है उसे वो एमआरपी पर ला रहा है औऱ उसके कॉटन का एमएसपी भी नहीं मिल रहा. ऐसे में वो खेती नहीं छोड़ेगा तो क्या करेगा?
भारत में कपास (कॉटन) की खेती में गिरावट के पीछे नीतिगत चुनौतियां भी कम नहीं हैं. इसकी वजह से किसान अब कपास छोड़कर सोयाबीन और धान जैसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. सरकार ने समय-समय पर कपास के आयात पर से सीमा शुल्क (Import Duty) को पूरी तरह हटा दिया है. इससे मिलों को सस्ता विदेशी कपास मिल जाता है, लेकिन घरेलू बाजार में भारतीय किसानों के कपास की मांग और कीमतें गिर जाती हैं. कई बार सीसीआई (Cotton Corporation of India) के नियमों में लचीलेपन की कमी और गुणवत्ता मानकों (जैसे नमी की मात्रा) के कारण किसानों को MSP का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इससे किसान व्यापारियों को कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर होते हैं.
खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब कपास किसानों को MSP से चंद रुपये ऊपर मिलने की उम्मीद जगती है तब टेक्सटाइल लॉबी अपने मुनाफे की ढाल आगे कर देती है. इस तरह कपास किसानों को एक तरफ गुलाबी सुंडी और बढ़ती लागत लहूलुहान कर रही है, तो दूसरी तरफ सरकार पर 'जीरो ड्यूटी' का दबाव बनाती बड़ी मिलें उनकी उम्मीदों को तोड़ रही हैं.
अक्सर देखा गया है कि जब भी इंडस्ट्री कोई मांग करती है, तो नीतिगत फैसले उनकी झोली में जा गिरते हैं, लेकिन जब किसान MSP के लिए सिसकता है, तो बाजार की ताकतें खामोश हो जाती हैं. सवाल बड़ा है कि इंडस्ट्री के कहने पर सरकार परोक्ष रूप से विदेशी किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने देश के कॉटन किसानों के हितों की कब तक बलि देती रहेगी? साल 2024-25 में भारत ने 41,39,933 गांठ कपास का आयात किया.
सरकार ने अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच जब कॉटन से 11% आयात शुल्क हटाया था तो आयात में 'उछाल' आया और उसने घरेलू किसानों की कमर तोड़ दी. अब इतिहास खुद को दोहराने की तैयारी में है. इंडस्ट्री फिर से मई से अक्टूबर के बीच वही 11% ड्यूटी हटाने की मांग कर रही है.
अगर ऐसा हुआ, तो विदेशी कपास एक बार फिर भारतीय किसान के 'नसीब' पर डाका डालेगी. कुल मिलाकर सरकारी नीतियों की नासमझी, वैज्ञानिकों की लापरवाही, कृषि मंत्रालय और आईसीएआर की कामचोरी और किसानों की मजबूरी...ने मिलकर कपास की खेती का बेड़ा गर्क कर दिया है. इस तरह कभी किसानों के लिए 'सफेद सोना' कहे जाने वाला कपास आज उनके लिए 'संकट’ बन चुका है.
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