सिसकता किसान-लुटता कंज्यूमर, मंडी से मॉल तक की लूट पर कौन लगाएगा लगाम?

सिसकता किसान-लुटता कंज्यूमर, मंडी से मॉल तक की लूट पर कौन लगाएगा लगाम?

जब खेत की मिट्टी और पसीने से उपजा गेहूं मंडियों में अपनी कीमत के लिए सिसकने लगे, लेकिन बाजार में उसी गेहूं से बना आटे का पैकेट आपकी जेब काटने पर आमादा हो, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था की चक्की में सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि किसान और उपभोक्ता दोनों का भरोसा भी पिस रहा है. यह सिर्फ किसान की हार नहीं बल्क‍ि आपकी थाली पर डकैती भी है.

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ओम प्रकाश
  • New Delhi ,
  • Apr 16, 2026,
  • Updated Apr 16, 2026, 10:12 AM IST

देश के मध्यम वर्ग और गरीब की थाली से जुड़ा एक कड़वा सच सामने आया है. कृषि मंत्रालय और उपभोक्ता मामले मंत्रालय के ताजा आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बाजार में 'मुनाफाखोरी' का खेल अपने चरम पर है. आंकड़ों के मुताबिक, जहां किसानों को मिलने वाले गेहूं के दाम में भारी गिरावट आई है, वहीं आम उपभोक्ताओं के लिए आटे की कीमतों में कोई राहत नहीं मिली है. जब गेहूं का दाम करीब 30 रुपये क‍िलो था, तब शोर मचा कि आटा महंगा है. लेक‍िन, आज जब किसान के गेहूं का दाम MSP से नीचे आ गया है तब सरकारी स‍िस्टम में चुप्पी क्यों छाई है? क्या किसान का घाटा ही उपभोक्ता की राहत है, या फिर इस खेल में असली मुनाफा कोई और ही ले उड़ रहा है? असल में, क‍िसान खेतों में अपनी फसल के अच्छे दाम के ल‍िए सिसक रहा है, दूसरी ओर बाजार में कंज्यूमर लुट रहा है. बीच में बिचौलियों का 'सिस्टम' फल-फूल रहा है. 

जब गेहूं की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार 'स्टॉक लिमिट' लगाती है और एक्सपोर्ट रोक देती है.  महंगाई कंट्रोल करने के नाम पर बाजार में OMSS यानी ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत सस्ता गेहूं उतारकर कीमतें तो गिरा देती है, लेकिन जब किसान को MSP नहीं मिल रहा है तो वह मौन क्यों है? दरअसल, यह नीत‍िगत व‍िरोधाभाष है, जो यह दर्शाता है कि मौजूदा व्यवस्था में 'सस्ती रोटी' का बोझ केवल किसान के कंधों पर है, जबकि बिचौलिए सुरक्षित और मुनाफे में हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है क‍ि जब गेहूं की कीमतें गिरी हैं, तो क्या सरकार आटा बेचने वाली कंपनियों पर 'प्राइस कैप' लगाएगी ताकि आम आदमी को महंगाई से राहत म‍िले? 

क‍िसान और कंज्यूमर को क्या म‍िला? 

किसानों को मार और ग्राहकों पर भार...इसका एक उदाहरण केंद्रीय कृष‍ि मंत्रालय और उपभोक्ता मामले व‍िभाग के आंकड़ों से समझते हैं. जनवरी 2025 में गेहूं की औसत कीमत 29.39 रुपये प्रति किलो थी, जो अप्रैल 2026 गिरकर 24.41 रुपये प्रति किलो रह गई. महज 15 महीनों में गेहूं के दाम में 4.98 रुपये प्रत‍ि क‍िलो की बड़ी कमी आई. 

अर्थशास्त्र के नियम के मुताबिक, जब कच्चा माल सस्ता हुआ तो आटे के दाम भी उसी अनुपात में गिरने चाहिए थे. लेकिन हकीकत इसके उलट है. जनवरी 2025 में जो आटा औसतन 40.32 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वह अप्रैल 2026 में गेहूं सस्ता होने के बावजूद 40.16 रुपये पर टिका हुआ है. यानी गेहूं के दाम करीब 5 रुपये क‍िलो गिरे, लेकिन आटे में राहत मिली मात्र 16 पैसे की. 

आम आदमी को क्या मिला?

ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि बिचौलिए, बड़ी कंपनियां और व्यापारी किसानों की बेबसी और उपभोक्ताओं की मजबूरी दोनों का फायदा उठा रहे हैं. जब फसल मंडियों में आती है, तो दाम कम होने का खामियाजा किसान भुगतता है, लेकिन उस सस्ते गेहूं को पीसकर 'ब्रांडेड' पैकेट में बेचने वाली कंपनियां अपना मार्जिन कम करने को तैयार नहीं हैं. 

एक तरफ किसान को उसकी मेहनत का वाजिब हक नहीं मिल रहा, तो दूसरी तरफ 'सस्ती रोटी' का इंतजार कर रहा आम आदमी आज भी वही पुराने ऊंचे दाम चुका रहा है. सवाल यह है कि जब लागत घट रही है, तो उसका सीधा लाभ कंज्यूमर तक क्यों नहीं पहुंच रहा? क्या प्राइस मॉनिटरिंग डिवीजन की निगरानी सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित है या इन बेलगाम कीमतों पर नकेल भी कसी जाएगी?

सस्ता गेहूं, महंगी रोटी 

इस पूरी कहानी के तीन अहम किरदार हैं. किसान, आटा मिल मालिक और आम उपभोक्ता. इसमें सबसे ज्यादा घाटे में किसान ही है. विडंबना यह है कि जब मिल मालिक किसानों से MSP से भी नीचे और सरकार की ओपन मार्केट सेल स्कीम के जरिए बेहद सस्ता गेहूं खरीद रहे हैं, तो आम उपभोक्ता की थाली की रोटी सस्ती क्यों नहीं हुई? मिल मालिकों के लिए यह स्थिति किसी लॉटरी जैसी है, जहां वे कच्चे माल की खरीद तो कम दामों पर कर रहे हैं, लेकिन बाजार में ब्रांडेड आटे के पैकेट की कीमतों में कोई कटौती नहीं कर रहे. क‍िसान गेहूं को उसकी एमएसपी 2585 से भी काफी कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं, तो दूसरी ओर बाजार के सरकारी 'ठेकेदार' चादर तानकर सो रहे हैं.

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