
देश में जैव ईंधन (बायोफ्यूल) को बढ़ावा देने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है. दरअसल, काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CSIR-NIIST) ने हैदराबाद की बायोटेक स्टार्टअप 3CousinLabs (3CL) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस परियोजना का उद्देश्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मिलने वाले अलग-अलग मौसमी फलों के गूदे और जूस से इथेनॉल बनाने की तकनीक और उसकी व्यावसायिक संभावनाओं का अध्ययन करना है.
इस परियोजना का नाम 'फ्रूट पल्प और जूस से इथेनॉल उत्पादन के लिए पायलट-स्केल और संभावनाओं का अध्ययन' रखा गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल फलों की बर्बादी कम करने के साथ-साथ किसानों के लिए आय का नया स्रोत भी साबित हो सकती है.
CSIR-NIIST के अनुसार, स्टार्टअप कंपनी 3CousinLabs ने फलों के गूदे और जूस को इथेनॉल में बदलने की एक नई तकनीक विकसित की है. इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले इसकी प्रभावशीलता और व्यावसायिक उपयोगिता की जांच की जाएगी. इसके तहत CSIR-NIIST अपनी प्रयोगशाला में 150 से 200 लीटर क्षमता वाले बैच में पायलट स्तर पर परीक्षण करेगा. इन परीक्षणों से तकनीक की विश्वसनीयता, उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए आवश्यक तकनीकी और आर्थिक आंकड़े जुटाए जाएंगे. यह जानकारी भविष्य में इथेनॉल उत्पादन इकाइयों की स्थापना में मददगार साबित होगी.
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें उन फलों का उपयोग किया जाएगा, जो बाजार में नहीं बिक पाते, प्रोसेसिंग ग्रेड के होते हैं या जल्दी खराब होने के कारण बर्बाद हो जाते हैं. ऐसे फलों को इथेनॉल में बदलकर उनका बेहतर उपयोग किया जाएगा. इससे फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आएगी और किसानों को अपनी अतिरिक्त उपज का भी उचित दाम मिल सकेगा. खासकर फल उत्पादकों और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के लिए यह अतिरिक्त आय का एक नया अवसर बन सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में फल उत्पादकों को बड़ा लाभ मिलेगा. मौसमी फलों के लिए नए बाजार तैयार होंगे, जिससे किसानों की आय अधिक स्थिर होगी. साथ ही बागवानी क्षेत्र में वैल्यू एडिशन को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर छोटे और विकेंद्रीकृत बायो-इथेनॉल उत्पादन केंद्र स्थापित करने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी.
यह परियोजना केंद्र सरकार के इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के अनुरूप भी है. सरकार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहती है. फलों से बनने वाला इथेनॉल इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. CSIR-NIIST का कहना है कि यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को भी मजबूत करेगी. संस्थान का मानना है कि यह साझेदारी भविष्य में भारत में फलों पर आधारित इथेनॉल उत्पादन तकनीक का रास्ता तैयार करेगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों और बागवानी क्षेत्र को भी लाभ मिलेगा. (PTI)