
बिहार में कुछ इथेनॉल प्लांट तालाबंदी की कगार पर आ गए हैं. मुजफ्फरपुर के मोतीपुर में ही चार प्लांट ऐसे हैं, जिनके भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगता दिख रहा है. कारणों की बात करें तो प्लांट मालिक केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति में बदलाव को दोषी ठहरा रहे हैं. पिछले साल सितंबर में इथेनॉल पॉलिसी में एक छोटे से बदलाव ने प्लांट मालिकों और किसानों के भविष्य को अधर में धकेल दिया है. सबसे ज्यादा असर प्रदेश के मक्का किसानों पर देखा जा रहा है, जो इथेनॉल प्लांट में अपनी उपज बेचकर अच्छी-खासी कमाई करते हैं. पॉलिसी में बदलाव से किसानों का मक्का बिना किसी दाम और काम के रह गया है. MSP की बात कौन कहे, किसानों के सामने मक्के की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है.
आखिर पॉलिसी में ऐसा क्या बदलाव हुआ जो किसान और इथेनॉल प्लांट खतरे में आ गए हैं? इस सवाल के जवाब में बिहार के कमॉडिटी एक्सपर्ट संतोष शर्मा ने 'किसान तक' से कहा, 'मक्के में चावल की दखल ने सारा काम खराब कर दिया. वे कहते हैं, सितंबर 2025 में भारत सरकार ने इथेनॉल को लेकर एक नया नियम लागू किया.
नियम के मुताबिक, अगर कोई इथेनॉल प्लांट एक वित्त वर्ष में एक लाख टन अनाज खपता करता है, तो उसमें 60 हजार मीट्रिक टन मक्का और 40 हजार मीट्रिक टन चावल रखना होगा. सितंबर से पहले ऐसा नियम नहीं था. पहले कोई भी इथेनॉल प्लांट सालभर में एक लाख टन केवल मक्का इस्तेमाल कर सकता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है.'
शर्मा ने कहा, '60 और 40 के इस अनुपात ने किसानों को सड़कों पर ला दिया है. सरकार के इस बदलाव ने बिहार जैसे मक्का प्रधान राज्य में भूचाल ला दिया है. किसानों ने इस उम्मीद में मक्के का रकबा और उत्पादन बढ़ाया कि उन्हें इथेनॉल फैक्ट्रियों में अच्छा रेट मिलेगा. फैक्ट्रियां 2400 रुपये क्विंटल तक का रेट दे भी रही थीं. लेकिन पॉलिसी में बदलाव से मक्के की खरीद गिर गई. प्लांट से किसानों के ट्रैक्टर वापस लौट रहे हैं. इस नीतिगत बदलाव से मक्का किसानों की हालत आत्महत्या वाली हो गई है.'
इथेनॉल प्लांट में मक्के के अलावा चावल की खपत जरूरी कर दी गई है. इसका सबसे बड़ा नुकसान प्लांट के बढ़े खर्च के रूप में देखा जा रहा है. पहले इथेनॉल प्लांट सस्ते मक्के से इथेनॉल बनाते थे और महंगे रेट पर कंपनियों को बेच देते थे. इससे उन्हें बंपर मुनाफा होता था. अब इस मुनाफे में सरकारी सेंधमारी हो गई है क्योंकि प्लांट को चावल महंगे रेट पर मिल रहा है, वह भी एफसीआई जैसी सरकारी एजेंसियों से. चावल 2600 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक भाव पर खरीदा जा रहा है जबकि मक्का 2400 रुपये या उससे कम में मिल जाता था. अब कंपनियों को बढ़ा हुआ खर्च खटक रहा है और वे अपना काम समेटने में लग गई हैं.
फैक्ट्री मालिकों का मानना है कि इथेनॉल बनाने में चावल की बाध्यता नीतिगत है, इस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन बड़ी समस्या तैयार इथेनॉल के दाम को लेकर है. नीतिगत बदलाव में सरकार ने नियम बनाया है कि चावल से तैयार इथेनॉल की कीमत मक्के से बने इथेनॉल की तुलना में 12 रुपये लीटर कम होगी. रेट के इस नए नियम ने इथेनॉल प्लांटों को घुटने पर ला दिया है.
मालिकों का कहना है कि एक तरफ उन्हें महंगे भाव पर चावल खरीदना पड़ रहा है, लेकिन तैयार इथेनॉल की बिक्री 12 रुपये कम पर हो रही है. मक्के के साथ उन्हें ऐसी समस्या नहीं थी. फैक्ट्रियों को सरकार की यह 'नाइंसाफी' इसलिए चुभ रही है क्योंकि चावल महंगा जबकि इथेनॉल सस्ता हो गया है. ऐसे में उनके सामने प्लांट बंद करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता.
कमॉडिटी एक्सपर्ट संतोष शर्मा कहते हैं, सरकार के नीतिगत बदलाव से किसानों के साथ इथेनॉल फैक्ट्रियां भी भारी दबाव में जा रही हैं. एक तरफ किसानों का मक्का नहीं खरीदा जा रहा है, तो दूसरी ओर फैक्ट्रियों का इथेनॉल सस्ते रेट पर खरीदा जा रहा है. फैक्ट्रियां अपने खर्च की कटौती का ठीकरा किसानों पर फोड़ रही हैं और मक्का किसान इसका अंजाम भुगत रहे हैं. अगर यही हाल रहा तो बिहार में जितनी भी 10-12 फैक्ट्रियां हैं, धीरे-धीरे तालाबंदी की शिकार हो जाएंगी.