
सरकार का नया नारा है 85% इथेनॉल ब्लेंडिंग. सुनने में ये 'आत्मनिर्भरता' का मास्टरस्ट्रोक लगता है, लेकिन जरा ठहरिए! देश की बढ़ती आबादी और सिकुड़ती जमीन के आईने में देखेंगे तो ये किसी 'डिजास्टर' की स्क्रिप्ट जैसा नजर आएगा. हम पेट से बड़ा 'पेट्रोल' को बनाने जा रहे हैं. हम दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं. 140 करोड़ से ज्यादा मुंह, और हर बीतते दिन के साथ खेती की कम हो रही जगह. शहर खेतों को निगल रहे हैं. ऐसे में जब इंसान के रहने के लिए जमीन कम पड़ रही है, तो क्या करोड़ों लीटर 'तेल' उगाने के लिए हमारे पास फालतू जमीन है? इस समय 20 फीसदी ब्लेंडिंग के लिए ही हमें एक पूरे बिहार जितनी जमीन भी कम पड़ रही है तो फिर 85 फीसदी के लिए क्या पूरा देश को ही हम 'फ्यूल फार्म' बना देंगे?
सीधी बात समझिए. खेत वही है, किसान वही है. अगर उस खेत में 'इथेनॉल' यानी गन्ना-मक्का और चावल ही पैदा होगा, तो दलहन, तिलहन और गेहूं कहां जाएंगे? जब अनाज की सप्लाई घटेगी, तो डिमांड बढ़ेगी. नतीजा क्या होगा? आपकी थाली की रोटी महंगी होगी. जो अनाज गरीबों के पेट में जाना चाहिए, वो अमीरों की SUV की टंकी में जलकर धुआं होगा. क्या हम प्रदूषण कम करने के नाम पर गरीबों से उनके जीने का हक छीनने की तैयारी कर रहे हैं? इथेनॉल बनाने के लिए चावल, गन्ने और मक्के जैसी फसलों को पानी की 'सुनामी' चाहिए. हमारा भूजल पहले ही दम तोड़ रहा है. ऐसे में 85 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब है धरती का सीना चीरकर आखिरी बूंद पानी भी निकाल लेना. आने वाली नस्लें क्या पिएंगी? क्या वे चमचमाती सड़कों पर बिना पानी के सिर्फ कारें चलाएंगी? या फिर हम गाड़ियों का तेल खुद पैदा करेंगे और पीने का पानी विदेश से मंगाएंगे?
कल जब आटे और चावल की कीमतें आउट ऑफ कंट्रोल होंगी, तो क्या ये 'फ्लेक्स फ्यूल' वाली कंपनियां इतनी बड़ी आबादी का पेट भरने की जिम्मेदारी लेंगी? ऊर्जा में आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है, लेकिन अगर उसकी कीमत खाद्य सुरक्षा है, तो फिा ये सौदा घाटे का है. सरकार को समझना होगा कि इंसान पेट्रोल पीकर नहीं, रोटी खाकर जिंदा रहता है.
अगर वाहनों के ईंधन की इतनी चिंता है तो इथेनॉल सीधे अनाज से बनाने (1जी) के बजाय 'कचरे' और 'पराली' (2G इथेनॉल) से बनाओ, किसान के निवाले से नहीं. लगभग 140 करोड़ लोगों वाले देश में अनाज से तेल बनाना 'विकास' नहीं, बल्कि एक ऐसी 'विनाशकारी' होड़ है जहां हम पर्यावरण बचाने के चक्कर में इंसानियत ही हार जाएंगे. जिस दिन खेत में अनाज की जगह सिर्फ 'तेल' उगेगा, उस दिन देश की तरक्की का धुआं निकलना तय है.
भारत जैसे मिडिल-इनकम देशों में एक तय नियम है-पहले पेट (Food), फिर पशु (Feed) और सबसे आखिरी में गाड़ी (Fuel). लेकिन 85% इथेनॉल ब्लेंडिंग का नया प्रस्ताव इस बुनियादी प्राथमिकता को ही सिर के बल खड़ा कर रहा है. यह सिर्फ प्रदूषण कम करने का मुद्दा नहीं है, यह करोड़ों लोगों के निवाले से जुड़ा सवाल है.
किसी भी विकासशील देश के लिए फसलें हमेशा खाने के लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. जब हमारे पास गन्ना और मक्का 'सरप्लस' था, तब सीधे अनाज से इथेनॉल तैयार करने की बात समझ आती थी. लेकिन, जब बढ़ती आबादी और बढ़ते तापमान की वजह से आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा ही खतरे में आती दिख रही है तब अनाज को इथेनॉल बनाकर गाड़ियों की टंकी में डालना 'आत्मनिर्भरता' नहीं, बल्कि 'आत्मघाती' कदम साबित हो सकता है.
भारतीय किसान की आर्थिक रीढ़ अब जमीन के लगातार छोटे होते टुकड़ों के बोझ तले दब रही है. जमीन बंटती जा रही है और किसानों की उम्मीद घटती जा रही है. भारत का किसान आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां उसकी मेहनत तो बढ़ रही है. लेकिन, जमीन का टुकड़ा लगातार छोटा होता जा रहा है. साल 1970 के दशक में जहां प्रति किसान औसतन 2.28 हेक्टेयर खेती थी, वहीं आज यह बंटते-बंटते महज 0.96 हेक्टेयर की एक संकरी पट्टी बनकर रह गई है. ऐसे में हम अनाज इथेनॉल के लिए पैदा करेंगे या फिर खाने के लिए?
जानी-मानी कृषि अर्थशास्त्री श्वेता सैनी कहती हैं, 'अभी सिर्फ 20 फीसदी ब्लेंडिंग के लिए ही हमें करीब 9 मिलियन हेक्टेयर जमीन की जरूरत है. यानी बिहार जैसे राज्य की पूरी खेती वाली जमीन भी छोटी पड़ जाएगी. वहां आठ मिलियन हेक्टेयर में खेती होती है.' ऐसे में अगर 85% इथेनॉल का लक्ष्य रखा गया है तो लगभग 38 मिलियन हेक्टेयर जमीन चाहिए होगी. जबकि भारत में कृषि योग्य (Net Sown Area) जमीन लगभग 140 मिलियन हेक्टेयर है. ऐसे में क्या हम देश के एक बड़े हिस्से की खेती को 'फ्यूल फार्म' बना देंगे? इसका बढ़ती आबादी की खाद्य सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा?
यही नहीं, अगर हम इथेनॉल के लिए धान, मक्का और गन्ने का रकबा बढ़ाते हैं, तो दालों और तिलहन के लिए जमीन कहां से आएगी? हम पहले ही सालाना 2 लाख करोड़ रुपये की दालें और खाद्य तेल बाहर से मंगवा रहे हैं. ऐसे में क्या हम इथेनॉल के लिए अपनी थाली को पूरी तरह विदेशों के भरोसे छोड़ देना चाहते हैं? जाहिर है कि हमें खाने और जलाने के बीच एक संतुलन बैठाना होगा. वरना बढ़ती जनसंख्या और अनिश्चित मॉनसून की वजह से जब खाद्य सुरक्षा खुद एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हो, तब मशीनों की प्यास बुझाने के लिए इंसान के निवाले से समझौता करना आत्मघाती कदम साबित हो सकता है.
इथेनॉल बनाना अच्छी बात है. इससे हम आयात बिल कम कर लेंगे. लेकिन इसे बनाने के लिए हमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करना होगा जो सस्टेनेबल हो. अभी भारत में सारा जोर 1G टेक्नोलॉजी (फर्स्ट-जेनरेशन) से इथेनॉल बनाने में है. जिसमें सीधे अनाज (मक्का, चावल और गन्ने) से तेल निलकता है.
इसका असली समाधान 2G टेक्नोलॉजी (सेकंड-जेनरेशन) में है. जिसमें फसलों के अवशेषों (पराली, छिलके) से इथेनॉल बनता है. भारत में प्रतिवर्ष लगभग 500 मिलियन टन कृषि कचरा पैदा होता है, जिसमें से पशुओं के चारे, घरेलू ईंधन और औद्योगिक उपयोग की पूर्ति करने के बाद भी करीब 140 मिलियन टन अतिरिक्त बच जाता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा पराली के रूप में खेतों में जला दिया जाता है
इसके बावजूद भारत में आज भी इथेनॉल की 2G टेक्नोलॉजी का बड़ा क्राइसिस है. महंगी तकनीक की वजह से इथेनॉल बनाने वाले 1G पर ही काम कर रहे हैं. सरकार के पास भी इसका कोई ठोस ढांचा नहीं है. बहरहाल, बिना 2G के 85 फीसदी वाला लक्ष्य सीधे आपकी रसोई के बजट पर डाका डाल सकता है.
इसलिए बढ़ती जनसंख्या और सिकुड़ती जमीन के बीच अगर हमें इथेनॉल भी बनाना है, तो तकनीक में भारी निवेश करना होगा. बिना पैदावार बढ़ाए और लैंड यूज को मैनेज किए बिना हम 'फूड वर्सेज फ्यूल' की इस आग में खुद को झोंक रहे हैं. कल को जब अनाज की कीमतें आउट ऑफ कंट्रोल होंगी और दाल-तेल और भी महंगे होंगे, तो क्या ये पॉलिसी बनाने वाले जिम्मेदारी लेंगे? विकास की गाड़ी तभी सही चलेगी जब देश के किसान के खेत में अनाज हो और लोगों की थाली में रोटी.