
अल नीनो का नाम सामने आते ही सूखा, लू, कम बारिश, जलसंकट और फसलों के नुकसान की तस्वीरें लोगों के मन में उभरने लगती हैं. वर्षों से अल नीनो को खेती और मॉनसून का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता रहा है. लेकिन क्या अल नीनो का प्रभाव केवल खेतों और किसानों तक सीमित है? विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो जितना मौसम को प्रभावित करता है, उससे कहीं अधिक उसका डर बाजार और उपभोक्ताओं पर असर डालता है.
दरअसल, अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जिसका पूर्वानुमान कई महीने पहले ही जारी कर दिया जाता है. मौसम एजेंसियां संभावित प्रभावों को लेकर चेतावनी देती हैं. इसके साथ ही सूखे, कम बारिश और उत्पादन घटने की आशंकाओं पर चर्चा शुरू हो जाती है. यहीं से एक ऐसे बाजार का जन्म होता है, जो वास्तविक प्रभाव सामने आने से पहले ही सक्रिय हो जाता है.
अल नीनो की चर्चा शुरू होते ही सबसे पहले खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जताई जाती है. माना जाता है कि कम बारिश से फसल उत्पादन घट सकता है, जिससे बाजार में सामान की उपलब्धता कम होगी. हालांकि वास्तविक स्थिति सामने आने में महीनों का समय होता है, लेकिन आशंकाओं के आधार पर बाजार में रिएक्शन तुरंत दिखाई देने लगता है.
व्यापारी वर्ग और बड़े बड़े स्टोरेज कंपनियों के मालिक संभावित कमी की बात कहकर जरूरी सामानों का स्टॉक बढ़ाने लगते हैं. कई बार जमाखोरी और बनावटी अभाव की स्थिति पैदा होती है. इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है और आम उपभोक्ताओं को महंगाई का सामना करना पड़ता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन में वास्तविक कमी आने से पहले ही बाजार में कीमतें बढ़ने लगती हैं. इसका सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ता है, जिनका घरेलू बजट भोजन और दैनिक जरूरतों के सामानों पर निर्भर होता है.
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसी भी संभावित आपदा या संकट की स्थिति में भय बाजार के लिए सबसे बड़ा कारोबारी अवसर बन जाता है. अल नीनो के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिलती है.
जब यह बात फैलती है कि आने वाले महीनों में फसलों को नुकसान हो सकता है, तब कई कारोबारी भविष्य की कमी का हवाला देकर माल रोकना शुरू कर देते हैं. इससे सप्लाई चेन प्रभावित होती है और बाजार में कृत्रिम संकट पैदा हो जाता है. इसका रिजल्ट होता है कि कुछ सामानों की कीमतें कई गुना तक बढ़ जाती हैं. इसका लाभ व्यापारिक वर्ग को मिलता है, जबकि आम इंसान आर्थिक बोझ झेलता है.
अल नीनो का एक और बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र में देखने को मिलता है. मौसम आधारित कृषि सलाहों में अक्सर यह चेतावनी दी जाती है कि अधिक तापमान और मौसम में बदलाव के कारण फसलों पर कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है.
इन आशंकाओं के चलते किसान एहतियात के तौर पर अधिक मात्रा में कीटनाशकों और केमिकल खादों की खरीद करने लगते हैं. कई मामलों में जरूरत से ज्यादा छिड़काव भी किया जाता है. इससे कीटनाशक उद्योग को लाभ मिलता है, लेकिन किसानों की लागत बढ़ जाती है.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गैर-जरूरी केमिकल उपयोग से मिट्टी की क्वालिटी, जैव विविधता और पर्यावरण पर लंबे समय के लिए बुरा प्रभाव पड़ सकता है. साथ ही पशुओं और मनुष्यों की सेहत पर भी इसका असर पड़ने की आशंका रहती है.
हाल के वर्षों में अल नीनो को लेकर बनी धारणा पर सरकार ने भी तथ्यात्मक जानकारी दी है. संसद में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि हर बार अल नीनो बनने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय मॉनसून कमजोर पड़ जाएगा.
लोकसभा में दिए गए एक लिखित उत्तर में पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि साल 1950 के बाद 16 बार अल नीनो की स्थिति बनी, लेकिन उनमें से केवल 7 बार ही सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई.
सरकार के अनुसार, भारतीय मॉनसून को प्रभावित करने वाले फैक्टरों में केवल अल नीनो ही शामिल नहीं है. इंडियन ओशन डायपोल (IOD), मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और महासागरीय और वायुमंडलीय परिस्थितियां भी बारिश के पैटर्न को प्रभावित करती हैं. ऐसे में केवल अल नीनो के आधार पर पूरे मॉनसून का अंदाजा लगाना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं माना जाता.
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो एक महत्वपूर्ण जलवायु घटना है और उसके प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन उतना ही जरूरी है कि उसके पूर्वानुमानों को सही और बैलेंस्ड तरीके से समझा जाए. कई बार वास्तविक नुकसान से अधिक असर उसके डर और उससे पैदा होने वाली बाजार गतिविधियों का होता है.
अल नीनो का भय यदि जमाखोरी, मुनाफाखोरी और गैर-जरूरी कृषि निवेश को बढ़ावा देता है, तो इसका नुकसान किसानों के साथ-साथ आम लोगों को भी उठाना पड़ता है. इसलिए जरूरत तथ्य आधारित जानकारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रभावी बाजार निगरानी की है, ताकि मौसम संबंधी आशंकाएं आर्थिक संकट में न बदलें.
कुल मिलाकर, अल नीनो केवल मौसम की घटना नहीं है, बल्कि उससे जुड़ा डर भी एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक फैक्टर बन चुका है. कई बार नुकसान बाद में पहुंचता है, लेकिन उसका बाजार पहले ही एक्टिव होकर अपना लाभ तय कर लेता है.