
अक्सर देखा गया है कि तालाब में ऑक्सीजन की कमी से मछलियां अचानक मरने लगती हैं, जिससे किसान की महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है. खासकर सर्दियों के जाड़े में, तालाब के पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरना एक आम समस्या है, जिसके कारण मछलियों का विकास रुक जाता है. इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए बाजार में पैडल-व्हील और बिजली से चलने वाले एरिएटर तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी ऊंची कीमत और हर महीने आने वाला भारी-भरकम बिजली का बिल छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों की पहुंच से बाहर होता है. कई किसान तो बिजली के खर्चे के डर से इन्हें खरीदने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते. नतीजा यह होता है कि ऑक्सीजन की कमी से किसानों को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन पंजाब के लुधियाना जिले के गांव करौंदिया के एक प्रगतिशील किसान, एस. जसवीर सिंह औजला ने अपनी सूझबूझ से बेहतरीन तोड़ निकाल लिया है. उन्होंने अपनी लगन से एक ऐसा सस्ता 'होममेड एरिएशन जुगाड़' तैयार किया है, जिसे कोई भी मामूली किसान खुद बनाकर अपने तालाब में ऑक्सीजन बढ़ा सकता है.
मछली पालन के व्यवसाय में सबसे बड़ी चुनौती तालाब के पानी में घुली हुई ऑक्सीजन के सही स्तर को लगातार बनाए रखना है. पानी में ऑक्सीजन का स्तर एक निश्चित सीमा से नीचे नहीं जाना चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऑक्सीजन का स्तर 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम हो जाए, तो मछलियों को सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगती है और वे पानी की सतह पर आकर मुंह चलाने लगती हैं. ऐसी स्थिति में अचानक बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हो जाती है. एक आम किसान के लिए यह मंजर किसी सदमे से कम नहीं होता, जहां बडे किसान महंगी मशीनों और ऑटोमेटिक सिस्टम का सहारा लेकर इस खतरे को टाल देते हैं, वहीं साधारण किसान अपनी आंखों के सामने अपनी पूंजी को डूबते देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाता. जसवीर सिंह की तकनीक ने इसी लाचारी और बेबसी को खत्म करने का काम किया है. उन्होंने विज्ञान के सरल सिद्धांतों का उपयोग कर एक ऐसा रास्ता दिखाया है जहां बिना किसी भारी मशीनरी के भी मछलियों की जान बचाई जा सकती है.
जसवीर सिंह द्वारा विकसित यह होममेड एरिएशन सिस्टम पूरी तरह से पानी के 'सरफेस एरिया' को बढ़ाने के सिद्धांत पर आधारित है. इस सिस्टम में तालाब के पानी को इस तरह से घुमाया या हवा में उछाला जाता है कि पानी की बूंदें वायुमंडल की ताजी हवा के संपर्क में ज्यादा से ज्यादा आ सकें. जब पानी की सतह हवा से टकराती है, तो वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन प्राकृतिक रूप से पानी के भीतर घुलने लगती है. इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बिजली की खपत न के बराबर होती है और यह बिना किसी महंगे उपकरणों के काम करता है. यह तकनीक पानी में ऑक्सीजन के स्तर को सुरक्षित रूप से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर बनाए रखने में सक्षम है, जो मछलियों की तेज बढ़वार और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए सही माना जाता है.
इस स्वदेशी तकनीक को अपनाने का सबसे बड़ा फायदा इसकी निर्माण लागत में छिपा है. जहां व्यावसायिक एरिएटर लगाने में लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं, वहीं जसवीर सिंह के इस जुगाड़ को किसान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामान से खुद तैयार कर सकते हैं. यह तकनीक केवल ऑक्सीजन ही नहीं बढ़ाती, बल्कि तालाब के जलीय वातावरण को मछलियों के रहने के लिए एकदम अनुकूल बना देती है. जब मछलियों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है, तो वे कम बीमार पड़ती हैं, उनका तनाव कम होता है और वे तेजी से बढ़ती हैं, इससे किसान की पैदावार और कमाई दोनों में बढ़ोतरी होती है. जसवीर सिंह का मानना है कि इस छोटे से नवाचार को अपनाकर एक किसान प्रति एकड़ लगभग 2 से 3 लाख रुपये तक के संभावित नुकसान को आसानी से टाल सकता है, जो कि किसी भी छोटे किसान के लिए एक बहुत बड़ी बचत है.
जसवीर सिंह औजला का यह आविष्कार आज के दौर में उन हजारों छोटे किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए फायदेमंद है, जो कम निवेश के कारण मछली पालन शुरू करने से कतराते हैं. इस मशीन की सरल और कम लागत ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसकी वजह से इसे कोई भी मछली पालक अपना सकता है. हालांकि, इस तकनीक को और अधिक प्रभावी, अभी और अधिक वैज्ञानिक सत्यापन की जरूरत है, ताकि तालाबों में और सटीक काम कर सके. फिर भी, पंजाब के इस कर्मठ किसान की इनोवेशन, अगर हमारे देश के किसान अपनी समस्याओं का समाधान खुद अपनी मिट्टी और अनुभव से तलाशने लगें, तो खेती और पशुपालन और मछली पालन को और भी लाभदायक बनाया जा सकता है. यह 'देसी जुगाड़' मछली पालकों के लिए काफी फायदे पहुंचा सकता है.
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