
भारत से बाहर भेजे जाने वाले तेलहन से बने चारे को ऑयलमील कहा जाता है. साल 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर तक भारत के ऑयलमील निर्यात में गिरावट देखी गई है. खासकर दिसंबर महीने में इसमें लगभग 40 प्रतिशत की बड़ी कमी आई. इसका सबसे बड़ा कारण सोयाबीन से बनने वाले सोयामील की कम बिक्री रही. पहले भारत बड़ी मात्रा में सोयामील विदेश भेजता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया.
सोयामील एक तरह का पशु आहार है, जिसे भारत कई देशों में भेजता है. नवंबर और दिसंबर 2025 में भारत ने सिर्फ 2.28 लाख टन सोयामील निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी समय 4.61 लाख टन भेजा गया था. इसका मतलब है कि बिक्री लगभग आधी रह गई. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का सोयामील अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा पड़ रहा है, इसलिए दूसरे देश सस्ता माल खरीद रहे हैं.
भारत के अंदर भी सोयामील की मांग पहले जैसी नहीं रही. पशुपालक अब सोयामील की जगह डीडीजीएस नाम का सस्ता चारा इस्तेमाल कर रहे हैं. यह चारा मक्का और चावल से बनने वाले इथेनॉल का बचा हुआ हिस्सा होता है और कीमत में कम होता है. इसी वजह से सोयामील बनाने वाली कंपनियों को नुकसान हो रहा है.
रैपसीड से बनने वाला मील भी ऑयलमील का एक हिस्सा है. हाल के महीनों में भारत में रैपसीड की पेराई कम हुई है, क्योंकि नई फसल फरवरी-मार्च में आएगी. इसके अलावा, दुनिया के बाजार में रैपसीड मील के दाम बढ़ गए हैं. भारत में इसका दाम 250 डॉलर प्रति टन है, जबकि जर्मनी के हैम्बर्ग में 247 डॉलर प्रति टन है. थोड़ा सा महंगा होने के कारण चीन जैसे देश भारत से कम खरीद कर रहे हैं.
इस साल अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के बीच भारत ने चीन को 6.77 लाख टन रैपसीड मील भेजा. यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में ज्यादा है, लेकिन आने वाले समय में कीमत बढ़ने से चीन की खरीद कम हो सकती है. अच्छी बात यह है कि भारत की कुछ नई कंपनियों को भी चीन में निर्यात की मंजूरी मिलने वाली है.
भारत से ऑयलमील खरीदने वाले देशों में दक्षिण कोरिया, चीन, बांग्लादेश, जर्मनी और फ्रांस शामिल हैं. दक्षिण कोरिया ने इस साल भारत से 2.87 लाख टन ऑयलमील खरीदा, जो पिछले साल से कम है. बांग्लादेश ने भी पहले के मुकाबले कम ऑयलमील मंगवाया. जर्मनी और फ्रांस ने भारत से सोयामील खरीदा, लेकिन मात्रा ज्यादा नहीं रही.
अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान भारत ने कुल 29.75 लाख टन ऑयलमील का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी समय 31.50 लाख टन किया गया था. यानी कुल निर्यात में 5.5 प्रतिशत की कमी आई. दिसंबर महीने में यह कमी और ज्यादा दिखी.
अगर भारत अपने ऑयलमील को सस्ते दाम पर और अच्छी गुणवत्ता के साथ बेच पाए, तो आने वाले महीनों में निर्यात फिर बढ़ सकता है. नई फसल आने के बाद रैपसीड मील की स्थिति सुधरने की उम्मीद है. सरकार और उद्योग मिलकर काम करें, तो किसानों और कंपनियों दोनों को फायदा हो सकता है.
इस तरह, सोयामील की कमजोर मांग और ऊंची कीमतों की वजह से भारत के ऑयलमील निर्यात में गिरावट आई है, लेकिन सही कदम उठाने से हालात बेहतर हो सकते हैं.
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