कोयला से खाद: 25 साल पहले जिस तकनीक ने डुबोए पैसे, उस पर सरकार ने दोबारा क्यों लगाया दांव?

कोयला से खाद: 25 साल पहले जिस तकनीक ने डुबोए पैसे, उस पर सरकार ने दोबारा क्यों लगाया दांव?

भारत में कोल गैसिफिकेशन की तकनीक पहले भी 1990 के दशक में अपनाई गई थी, लेकिन अधिक लागत, तकनीकी समस्याएं और कम फायदे के कारण कई प्लांट बंद हो गए. वर्तमान में वैश्विक सप्लाई चेन संकट और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों के चलते सरकार ने इसे आधुनिक तकनीक के साथ फिर से शुरू करने पर जोर दिया है, ताकि देश खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सके.

Coal Gasification urea productionCoal Gasification urea production
रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Jun 04, 2026,
  • Updated Jun 04, 2026, 5:28 PM IST

पश्चिम एशिया में तनाव से खादों की सप्लाई चेन टूटने के बाद सरकार ने कोयले से खाद बनाने का फैसला लिया है. इसे कोल गैसिफिकेशन प्रोसेस कहा जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि देश में यह प्रयोग पहले भी हो चुका है और इसके चक्कर में कुछ कारखाने बंद भी हो चुके हैं.

नब्बे के दशक में फर्टिलाइजर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCIL) के सहयोग से रामागुंडम (तेलंगाना) और तालचर (ओडिशा) में शुरू किए गए कोयला आधारित यूरिया प्लांटों को आर्थिक घाटे, पुरानी तकनीक और लगातार आने वाली तकनीकी खराबी के कारण साल 2002 तक पूरी तरह बंद करना पड़ा था. लेकिन ईरान अमेरिका की लड़ाई ने इसे फिर से शुरू करने की नौबत ला दी है. 

खाद में आत्मनिर्भरता के लिहाज से यह अच्छी कोशिश है. मिट्टी और पर्यावरण के लिए भी यह अच्छी पहल है क्योंकि कोयले से बनने वाली खाद में मुख्य रूप से नीम कोटेड यूरिया का निर्माण होगा. इससे रासायनिक खाद में नीम का प्रयोग बढ़ेगा, मिट्टी को कुछ ऑर्गेनिक तत्व मिलेंगे और नीम किसानों को भी फायदा होगा. सरकार ने इस तरह की असफल कोशिश पहले भी की है जिसके बाद कई कारखाने बंद हो गए. क्यों बंद हुए, इसके कारणों पर आगे चर्चा करेंगे, उससे पहले जान लेते हैं कि कोल गैसिफिकेशन प्रोसेस क्या है और इससे खाद कैसे बनाई जाती है.

कोल गैसिफिकेशन प्रोसेस क्या है?

इस प्रक्रिया में कोयले से खाद बनाई जाती है जिसकी शुरुआत ओडिशा के तालचर फर्टिलाइजर प्लांट में की गई है. यह देश का पहला प्लांट है जो कोयले से खाद बनाएगा. आपको लगता होगा कि इस प्रक्रिया में कोयले को जलाकर खाद बनाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. यह प्रक्रिया कुछ अलग है. इसके लिए रिएक्टर में कोयले की प्रोसेसिंग की जाती है जिसमें एक ऊंचे बर्तन में कोयले को 1000-1500 डिग्री तापमान पर रखा जाता है. 

इस कोयले को सीधा जलाने के बजाय बहुत कम ऑक्सीजन और पानी की भाप के साथ मिलाया जाता है. इससे कोयला पिघलकर गैस में बदल जाता है जिसे सिनगैस कहते हैं. इस सिनगैस से हाइड्रोजन को अलग करके नाइट्रोजन के साथ मिलाया जाता है जिससे अमोनिया बनता है. बाद में इसी अमोनिया को कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलाकर नीम कोटेड यूरिया तैयार की जाती है.  

कोयले से खाद का प्रयोग पहले भी हुआ

भारत में कोल गैसिफिकेशन का प्रयोग पहली बार नहीं हो रहा है, बल्कि 90 के दशक में इसे आजमाया जा चुका है. उस वक्त तालचर और तेलंगाना के रामागुंडम में कोयला से खाद के कारखाने शुरू किए गए थे. लेकिन भारी वित्तीय नुकसान, टेक्निकल गड़बड़ी और इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में इन प्लांटों को 2002 में पूरी तरह से बंद करना पड़ा. एक तरह से सरकार का यह प्रयास भारी आर्थिक नुकसान वाला साबित हुआ. सरकार के करोड़ों रुपये इसमें डूब गए.

सवाल है कि ऐसा क्या हुआ जो बड़ी तैयारी और भारी खर्च के बावजूद प्लांट बंद हो गए? कारणों की बात करें तो उस वक्त कारखाने में विदेशी गैसीफायर लगे थे जिसमें कोयले से गैस बनाई जाती थी, फिर उससे खाद का निर्माण होता था. इस गैसीफायर को जर्मनी की कंपनी क्रूप कॉपर्स ने डिजाइन किया था. यह तकनीक कम राख वाले कोयले के लिए तैयार की गई थी, लेकिन भारत के कोयले में बहुत अधिक राख निकलती थी. इसकी मात्रा 40 प्रतिशत तक होती थी. अधिक राख की वजह से प्लांट के बॉयलर और ट्यूब बार-बार जाम हो जाते थे, उसमें डैमेज होता था. प्लांट बार-बार बंद हो जाते थे.

गैसीफायर के इस तकनीक में देश उस वक्त आत्मनिर्भर नहीं था. कल पुर्जे टूटने और उसकी मरम्मत और रखरखाव के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था. इस विदेशी निर्भरता ने भी प्लांटों को बंद होने पर मजबूर कर दिया. 

दूसरी बड़ी समस्या प्लांट में बिजली सप्लाई की थी. उस वक्त कारखानों में कैप्टिव पावर प्लांट की सुविधा नहीं थी. सरकारी बिजली पर पूरा काम होता था. जब भी बिजली कट जाती थी, प्लांटों में खाद निर्माण बंद हो जाता था. इस तरह की टेक्निकल गड़बड़ी और बिजली की कमी से मुश्किल से 30-40 प्रतिशत ही खाद तैयार हो पाती थी. इस भारी खर्च के बावजूद इतना कम उत्पादन उचित नहीं था. यही वजह है कि कोल गैसिफिकेशन का प्रयोग पूरी तरह से ठप हो गया.

अभी सरकार क्या कर रही है?

पूर्व में यह प्रयोग भले नाकाम हुआ है, लेकिन सरकार को एक नई उम्मीद जगी है. सरकार का पूरा ध्यान खादों के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने पर है. यह तभी होगा जब हम देसी तकनीक और संसाधनों का पूरी तरह उपयोग करेंगे. इसके लिए सरकार ने 37500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है. इसके तहत देश में 2030 तक 1000 टन कोयले का गैसिफिकेशन किया जाएगा और खाद बनाई जाएगी. अगर ऐसा होता है तो देश वाकई खादों में आत्मनिर्भर हो जाएगा. अब देखने वाली बात होगी कि पुरानी गलतियों से सीख लेते हुए इस बार कोल गैसिफिकेशन का काम कितना कामयाब होता है?

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