
चालू वित्त वर्ष के पहले 11 महीनों में भारत के खली (ऑयलमील) निर्यात में चीन एक बड़ा खरीदार बनकर उभरा है. उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (SEA) ने जानकारी दी है कि अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत ने चीन को 7.79 लाख टन खली निर्यात की, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 20 गुना से भी ज्यादा है. इस तेज उछाल के पीछे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धी कीमतें सबसे बड़ा कारण रही हैं, जिसने वैश्विक बाजार में भारत को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है.
इस निर्यात वृद्धि में सबसे अहम भूमिका सरसों खली की रही है. कुल निर्यात में लगभग पूरा हिस्सा इसी का रहा, जबकि कैस्टर सीड मील की हिस्सेदारी सीमित रही है. आंकड़ों के मुताबिक, चीन ने इस दौरान भारत से 7.71 लाख टन सरसों खली और करीब 7,500 टन कैस्टर मील आयात किया है. पिछले साल जहां यह आंकड़ा महज 38 हजार टन के आसपास था, वहीं इस बार इसमें जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है.
भारतीय सरसों खली की कीमत फिलहाल करीब 225 डॉलर प्रति टन के आसपास है, जो यूरोपीय सप्लायर्स की तुलना में काफी कम है. यूरोप में यही उत्पाद करीब 297 डॉलर प्रति टन के स्तर पर है. कीमतों में इस बड़े अंतर ने चीन जैसे बड़े खरीदार को भारत की ओर आकर्षित किया है, जिससे निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली है.
मार्च 2025 में चीन ने कनाडा की सरसों खली और तेल पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जिसके बाद वहां से आयात महंगा हो गया था. इस फैसले के चलते चीन को वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश करनी पड़ी और भारत इस मौके का सबसे बड़ा लाभार्थी बना.
हालांकि, अब हालात बदल रहे हैं. चीन ने 1 मार्च 2026 से कनाडाई सरसों खली पर लगाए गए टैरिफ को अस्थायी रूप से हटा दिया है, जो साल के अंत तक लागू रहेगा. इससे भारतीय निर्यातकों के सामने फिर से कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी हो सकती है और चीन का बाजार बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
जहां एक ओर चीन को निर्यात में तेज बढ़ोतरी हुई है, वहीं कुल खली निर्यात के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं. फरवरी महीने में भारत का कुल खली निर्यात करीब 22 प्रतिशत घटकर 2.57 लाख टन रह गया है, जो पिछले साल इसी महीने 3.30 लाख टन था. पूरे वित्त वर्ष के पहले 11 महीनों में भी कुल निर्यात करीब 11 प्रतिशत घटकर 34.93 लाख टन रह गया है.
वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव का असर भी भारतीय निर्यात पर साफ दिखाई दे रहा है. अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण मिडिल ईस्ट और यूरोप को जाने वाली शिपमेंट प्रभावित हो रही हैं. रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्गों में अस्थिरता के चलते शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक रास्ते अपना रही हैं.
इस कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है, जिससे ट्रांजिट समय 10 से 15 दिन तक बढ़ रहा है और लागत में भी इजाफा हो रहा है. उद्योग संगठन का कहना है कि अगर वैश्विक हालात स्थिर नहीं हुए और चीन में प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो भारतीय ऑयलमील निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, कीमतों में प्रतिस्पर्धा और सप्लाई क्षमता के दम पर भारत के पास अभी भी बाजार में बने रहने का अच्छा मौका है. (पीटीआई)